

शिवसेना नाम और चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी।
शिंदे गुट ने विधायकों के बहुमत और पार्टी के आंतरिक चुनावों का मुद्दा उठाया।
चुनाव आयोग के अधिकार और विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर भी दलीलें पेश की गईं।
Shiv Sena Supreme Court Hearing: शिवसेना पार्टी के नाम व चिह्न पर कब्जे को लेकर उद्धव ठाकरे व एकनाथ शिंदे गुट के बीच सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई जारी है। बुधवार को इस मामले पर एक बार फिर शुरू हुई सुनवाई में शिंदे गुट की ओर से सीनियर वकील मनिंदर सिंह ने शिवसेना संगठन के अंदर होने वाले आंतरिक चुनाव का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि जब पार्टी के अंदर होने वाले चुनाव सही ढंग से नहीं कराए गए तो ऐसे में इस आधार पर पार्टी के नेतृत्व का फैसला नहीं लिया जा सकता है।
सिंह ने कहा कि 2018 में शिवसेना के संविधान में बदलाव के बाद पार्टी के अंदर बिना चुनाव के अपॉइंटमेंट किए गए। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी में किसके पास बहुमत है, यह विधायकों की संख्या के आधार पर तय होता है। ऐसे में शिवसेना विवाद मामले में विधायकों के बहुमत को नकारा नहीं जा सकता है।
शिंदे गुट के वकील सिंह ने अपनी दलील के दौरान सुभाष देसाई केस का भी जिक्र किया। उन्होंने पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे पर तंज कसते हुए कहा कि वह खुद भूल जाते हैं कि किसी भी पार्टी के चुने चुने हुए विधायक व सांसदों को मिले वोटों के प्रतिशत के आधार पर सिंबल मिलता है।
साथ ही पार्टी में किसके पास मेजॉरिटी है, यह तय करने के लिए विधायकों व सांसदों का नंबर जरूरी हैं। इस मामले में उद्धव गुट के मुकाबले एकनाथ शिंदे गुट को ज्यादा विधायकों व सांसदों का समर्थन है। इस लिहाज से शिवसेना का नेतृत्व शिंदे के पास ही होना चाहिए।
शिंदे गुट के वकील सिंह ने कहा कि चुनाव आयोग के पास किसी भी पार्टी की मान्यता को रद्द करने का अधिकार है। अगर कोई पार्टी अंदरूनी चुनाव नहीं कराती है, तो उसका रजिस्ट्रेशन कैसिल हो जाता है। पार्टी के ऑर्गनाइजेशनल स्ट्रक्चर का टेस्ट पूरी तरह से चुनावों पर
निर्भर करता है। यह दलील देना कि चुनाव आयोग के पास मान्यता रद्द करने का अधिकार नहीं है, सही नहीं है। उन्होंने यह सवाल उठाया कि अगर हम नॉमिनेशन का तरीका इस्तेमाल करते है, तो क्या हम इसके माध्यम से पार्टी चीफ को चुनेंगे।
शिंदे गुट की ओर से उनके वकील ध्रुव मेहता ने दलील देते हुए कहा कि 21 जून 2022 को हुई मीटिंग के समय एकनाथ शिंदे शिवसेना विधायक दल के नेता थे। उनके साथ हुई हुई मीटिंग में विधायकों ने भरत गोगावले को व्हिप चुना।
ऐसे में गोगावले की नियुक्ति पर सवाल नहीं उठाए जा सकते हैं। मेहता ने कहा कि इस केस की ओरिजिनल पिटीशन में लगाए गए सभी आरोप बेबुनियाद हैं। लेजिस्लेटिव असेंबली का स्पीकर एक ट्रिब्यूनल है।
स्पीकर को 10वें शेड्यूल के तहत फैसला लेना होता है और उन्होंने इसके हिसाब से फैसला लिया है। यह सुनवाई आगे भी जारी रहेगी। शिंदे गुट के वकीलों की दलील खत्म होने के बाद ठाकरे के वकील अपनी फाइनल दलील पेश करेंगे।