

Panvel Sarpanch Cleans Sewage Drain Himself: नवी मुंबई के पनवेल तहसील से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने राजनीति और समाज सेवा के बीच की लकीर को और भी गहरा कर दिया है। अक्सर हम जनप्रतिनिधियों को वादे करते या मंचों से भाषण देते देखते हैं, लेकिन मालडुंगे ग्रुप ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले धोदाणी गांव के सरपंच सीताराम चौधरी ने जो किया, वह किसी मिसाल से कम नहीं है।
धोदाणी गांव एक आदिवासी बहुल इलाका है, जहां से गुजरने वाला मुख्य सीवरेज (नाला) पिछले काफी समय से कचरे और प्लास्टिक की वजह से पूरी तरह जाम हो चुका था।, स्थिति इतनी विकट हो गई थी कि पूरे इलाके में असहनीय बदबू फैल गई थी। चूंकि मानसून का समय बिल्कुल करीब है, ऐसे में नाला जाम होने के कारण गंदा पानी सड़कों पर आने और मलेरिया या डेंगू जैसी गंभीर बीमारियां फैलने का बड़ा खतरा मंडरा रहा था। सरपंच सीताराम चौधरी ने इस समस्या को लेकर कई बार ग्रामीणों से सार्वजनिक अपील की थी कि वे कचरा और प्लास्टिक सार्वजनिक जगहों या नालों में न फेंकें, लेकिन उनकी इन अपीलों को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा था। लोग अपनी आदतों से बाज नहीं आ रहे थे, जिसके परिणाम स्वरूप नाले में गाद और प्लास्टिक का अंबार लग गया था।
जब बातों और अपीलों का कोई असर नहीं हुआ, तो सरपंच चौधरी ने किसी कर्मचारी या सफाईकर्मी का इंतजार करने के बजाय खुद कमान संभालने का फैसला किया। उन्होंने न हिचकिचाहट दिखाई और न ही पद की गरिमा की परवाह की; वे सीधे गंदे सीवरेज के भीतर उतर गए। हाथ में फावड़ा थामे एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि को नाले के कीचड़ और गंदगी के बीच सफाई करते देख हर कोई दंग रह गया। उन्होंने अपने हाथों से प्लास्टिक की थैलियों और जमा हुई गाद को बाहर निकाला ताकि पानी का रास्ता साफ हो सके।
सरपंच ने इस दौरान एक बहुत ही महत्वपूर्ण चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि हालांकि धोदाणी इलाके के नालों को पक्का कर दिया गया है, लेकिन लोगों द्वारा फेंका गया यह कचरा अंततः पास की नदी और बांध (डैम) के पानी में जाकर मिल रहा है। यह केवल एक गांव की गंदगी का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर पर्यावरण और उन हजारों लोगों की सेहत से जुड़ा है जो इस बांध का पानी पीते हैं।
सरपंच सीताराम चौधरी का यह कदम केवल एक सफाई अभियान नहीं था, बल्कि उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश था जो सार्वजनिक स्वच्छता को गंभीरता से नहीं लेते। उनकी इस पहल की पूरे इलाके में जमकर सराहना हो रही है। इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि एक सच्चा जनप्रतिनिधि वही है जो केवल आदेश न दे, बल्कि जरूरत पड़ने पर खुद जमीन पर उतरकर आदर्श उदाहरण पेश करे।
अब गांव वालों में भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। उम्मीद है कि सरपंच को इस तरह नाले में उतरकर काम करते देख ग्रामीण अब भविष्य में नालों को कचरा मुक्त रखने में सहयोग करेंगे। यह खबर हमें याद दिलाती है कि समाज में बदलाव केवल नियमों से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत उदाहरणों और नेतृत्व की शक्ति से आता है।