'पेड़ों की कटाई सैनिकों के बलिदान जैसी', पंकजा मुंडे के बयान पर सोशल मीडिया पर मचा बवाल, अंजलि दमानिया ने घेरा

Pankaja Munde Controversial Statement: महाराष्ट्र की मंत्री पंकजा मुंडे ने विकास के लिए पेड़ों की कटाई की तुलना सीमा पर सैनिकों के बलिदान से कर दी। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई है।
Pankaja Munde Soldiers Remark
मंत्री पंकजा मुंडे (सोर्स: सोशल मीडिया)
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Pankaja Munde Soldiers Remark: महाराष्ट्र की राजनीति में अपने बेबाक बयानों के लिए जानी जाने वाली पर्यावरण मंत्री पंकजा मुंडे एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। इस बार मुद्दा 'मुंबई जलवायु सप्ताह' (Mumbai Climate Week) के दौरान दिया गया उनका एक विवादित बयान है। मुंडे ने बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं के लिए पेड़ों, विशेषकर मैंग्रोव की कटाई का बचाव करते हुए उनकी तुलना देश की सीमा पर तैनात सैनिकों से कर दी।

क्या है पूरा मामला?

मुंबई में आयोजित एक संवाद कार्यक्रम में पंकजा मुंडे ने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन पर बात की। उन्होंने कहा कि जिस तरह एक मां अपने बेटे को पालती है और फिर उसे देश के लिए सीमा पर भेजने का साहस दिखाती है, वैसे ही अगर हम पेड़ उगाते हैं, तो हमें विकास के लिए उन्हें काटना भी पड़ सकता है। लेकिन हम उन्हें कहीं और लगा सकते हैं।" मुंडे यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने पेड़ों को सीधे तौर पर 'सैनिक' करार देते हुए कहा कि ये पेड़ जीवित रहते हुए हमारी रक्षा करते हैं और हटाए जाने (कटने) के बाद विकास में योगदान देते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि प्रगति को रोका नहीं जा सकता; अगर विकास के लिए पांच पेड़ काटने पड़ते हैं, तो हमें दस नए पेड़ लगाने चाहिए।

अंजलि दमानिया ने साधा निशाना

मंत्री के इस बयान का वीडियो वायरल होते ही सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं ने उन्हें आड़े हाथों लिया। प्रसिद्ध कार्यकर्ता अंजलि दमानिया ने 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर क्लिप साझा करते हुए मंत्री की "समझ" पर दुख जताया। आलोचकों का कहना है कि पेड़ों की कटाई की तुलना सैनिकों की शहादत से करना न केवल अतार्किक है, बल्कि यह पर्यावरण विनाश को जायज ठहराने की एक कमजोर कोशिश है।

पांच सितारा होटल बनाम रेगिस्तान की बर्फ

पंकजा मुंडे ने जलवायु मुद्दों पर चर्चा करने के तौर-तरीकों पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि जहाँ लोग आराम से पांच सितारा होटलों में बैठकर, चाय-कॉफी और बिस्कुट का आनंद लेते हुए मुंबई जलवायु सप्ताह के बारे में बातें कर रहे हैं, वहीं असली सैनिक देश की रक्षा के लिए बर्फ और रेगिस्तान जैसी कठिन परिस्थितियों में अपनी जान जोखिम में डालकर खड़े हैं। उनका तर्क था कि केवल चर्चा करने के बजाय जमीनी हकीकत और विकास की जरूरतों को समझना चाहिए।

यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब मुंबई में तटीय सड़क (Coastal Road) और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए मैंग्रोव और आरे जैसे जंगलों की कटाई पर लंबे समय से विवाद चल रहा है।

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