'तलाक-ए-बिद्दत पर रोक, तलाक-ए-अहसन पर नहीं', बंबई HC ने खारिज किया मुकदमा, जानें क्या है इसके मायने

Bombay High Court: जलगांव में एक मुस्लिम महिला ने बंबई उच्च न्यायालय में अपने अपने पति एवं सास-ससुर के खिलाफ मुकदमा दायर किया था। हालांकि, बंबई हाई कोर्ट ने इस दायर खारिज कर दिया है।
बम्बई उच्च न्यायालय ने एक मुस्लिम महिला द्वारा अपने पति एवं सास-ससुर के खिलाफ दायर मुकदमा खारिज करते हुए कहा है कि केवल ‘तलाक-ए-बिद्दत' (तत्काल तीन बार तलाक-तलाक बोलना) निषिद्ध किया गया है, न कि तलाक देने के पारंपरिक तरीके ‘तलाक-ए-अहसन' को।
बंबई हाई कोर्ट (डिजाइन फोटो)
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मुंबई: बंबई उच्च न्यायालय ने एक मुस्लिम महिला द्वारा अपने पति एवं सास-ससुर के खिलाफ दायर मुकदमा खारिज करते हुए कहा है कि केवल ‘तलाक-ए-बिद्दत' (तत्काल तीन बार तलाक-तलाक बोलना) निषिद्ध किया गया है, न कि तलाक देने के पारंपरिक तरीके ‘तलाक-ए-अहसन' को।

तलाक-ए-अहसन के तहत एक बार तलाक कहा जाता है, जिसके बाद महिला को इद्दत या तीन महीने की प्रतीक्षा अवधि से गुजरना पड़ता है। उच्च न्यायालय की औरंगाबाद पीठ ने कहा कि मुस्लिम महिला (निकाह से संबंधित अधिकार का संरक्षण) अधिनियम के तहत तलाक की परिभाषा के दायरे में तलाक के वे रूप शामिल हैं जिनका तात्कालिक प्रभाव होता है या जो अपरिवर्तनीय तलाक होते हैं।

हाई कोर्ट ने खारिज किया मामला

न्यायमूर्ति विभा कंकनवाड़ी और संजय देशमुख की खंडपीठ ने जलगांव में एक महिला द्वारा अपने पति एवं सास-ससुर के खिलाफ संबंधित अधिनियम की धारा-चार के तहत 2024 में दर्ज मामले को खारिज कर दिया। इस धारा के अनुसार, कोई भी मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को तत्काल तीन तलाक देता है उसे तीन साल तक की कैद की सजा हो सकती है। तलाक की इस प्रक्रिया को तलाक-ए-बिद्दत कहा जाता है।

कानून की प्रक्रिया का होता दुरुपयोग

अदालत ने कहा कि इस मामले में व्यक्ति ने अपनी पत्नी को तलाक-ए-अहसन दिया था, जो तलाक की घोषणा है। अंतिम तलाकनामा घोषणा के तीन महीने बाद दिया गया था। तलाक-ए-अहसन का कानूनी प्रभाव केवल 90 दिनों के बाद लागू हुआ, जिसके दौरान दंपति ने सहवास फिर से शुरू नहीं किया था। अधिनियम के प्रावधानों के तहत तीन तलाक प्रतिबंधित है, न कि तलाक-ए-अहसन, ऐसी स्थिति में यदि व्यक्ति और उसके माता-पिता को मुकदमे का सामना करने के लिए कहा जाता है तो यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

तलाक का यह तरीका दंडनीय नहीं

दंपति ने 2021 में शादी की थी। वे 2023 में अलग हो गए, और व्यक्ति ने गवाहों की मौजूदगी में दिसंबर 2023 में ‘तलाक-ए-अहसन' प्रक्रिया का इस्तेमाल किया। व्यक्ति ने अपनी याचिका में दावा किया था कि अधिनियम के प्रावधानों के तहत, तलाक का यह तरीका दंडनीय नहीं है। पीठ ने कहा कि आईपीसी के तहत उत्पीड़न के अपराध के लिए प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाती है।

चूंकि, प्राथमिकी तलाक के मुद्दे से संबंधित है, इसलिए यह केवल पति के खिलाफ है और ससुराल वालों को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता है। अगर उन लोगों के खिलाफ मामला जारी रखा जाता है तो यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

(एजेंसी इनपुट के साथ)

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