

Aaditya Thackeray On Worli Seat Without Sachin Ahir: महाराष्ट्र की राजनीति में मंगलवार को हुआ बड़ा फेरबदल महज एक दलबदल नहीं, बल्कि भविष्य के चुनावों को प्रभावित करने वाली एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। उद्धव ठाकरे गुट के कद्दावर नेता और विधान परिषद सदस्य सचिन अहीर का एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल होना एक दूरगामी राजनीतिक सोच का परिणाम माना जा रहा है।
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने सचिन अहीर पर बड़ा दांव खेलकर साल 2029 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए आदित्य ठाकरे के गढ़ माने जाने वाले वर्ली निर्वाचन क्षेत्र में अभी से मजबूत मोर्चाबंदी शुरू कर दी है, जिससे आने वाले समय में आदित्य ठाकरे की चुनावी राह बेहद कठिन हो सकती है।
अगर वर्ली सीट के सियासी आंकड़ों और इतिहास पर नजर डालें, तो सचिन अहीर साल 1999 से 2014 तक लगातार तीन बार इस क्षेत्र से विधायक रहे हैं। हालांकि, 2014 के चुनाव में उन्हें अविभाजित शिवसेना के सुनील शिंदे से हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर उनका जनाधार कभी कमजोर नहीं हुआ। साल 2019 में जब उद्धव ठाकरे ने आदित्य ठाकरे को वर्ली की सबसे सुरक्षित सीट से चुनावी मैदान में उतारने का फैसला किया, तो उन्होंने सबसे पहले सचिन अहीर को पार्टी में शामिल कराया था।
सचिन अहीर के समर्थन और रणनीतिक कौशल के कारण ही 2019 में आदित्य ठाकरे के लिए वर्ली की राह आसान हुई थी। बाद में अहीर और सुनील शिंदे दोनों को विधान परिषद भेजकर सेट किया गया था, लेकिन अब अहीर के जाने से समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं।
सचिन अहीर के पाला बदलते ही ठाकरे गुट के एक और महत्वपूर्ण नेता और विधान परिषद सदस्य सुनील शिंदे ने भी बगावती सुर अख्तियार कर लिए हैं। उन्होंने अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि वर्ली किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि शिवसेना की है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए वरिष्ठ नेताओं को गंभीर आत्मपरीक्षण करने की सख्त जरूरत है।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि सुनील शिंदे भी शिंदे गुट में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। दरअसल, सुनील शिंदे का विधान परिषद का कार्यकाल साल 2027 में समाप्त हो रहा है और मौजूदा संख्या बल के हिसाब से उनका दोबारा चुना जाना मुश्किल है; ऐसे में शिंदे गुट में जाकर वे वर्ली से आदित्य ठाकरे के खिलाफ सीधे चुनाव लड़ने का मौका पा सकते हैं।
तकनीकी और संवैधानिक दृष्टि से देखा जाए तो सचिन अहीर पर फिलहाल दल-बदल विरोधी कानून के तहत कोई कार्रवाई या अयोग्यता का खतरा नहीं है। भारतीय संविधान के नियमों के अनुसार, विधानसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या विधान परिषद के सभापति और उपसभापति जैसे संवैधानिक पदों पर बैठने वाले व्यक्तियों को इस कानून से विशेष छूट प्राप्त है; चूंकि सचिन अहीर सीधे उपसभापति पद के लिए नामांकित हुए हैं, इसलिए वे कानूनी रूप से पूरी तरह सुरक्षित हैं।
वहीं दूसरी तरफ, नीलम गोरहे का उपसभापति पद से पत्ता कटने के पीछे बीजेपी की नाराजगी को मुख्य वजह बताया जा रहा है। बजट सत्र के दौरान तत्कालीन उपसभापति नीलम गोरहे ने महायुति सरकार के मंत्री शंभूराज देसाई की शिकायत पर सातारा के एसपी को निलंबित कर दिया था, जिसके बाद बीजेपी और शिंदे सेना आमने-सामने आ गई थीं; इसी विवाद की गाज आखिरकार नीलम गोरहे पर गिरी है।