47 सेकंड में उजड़े थे हजारों परिवार, लातूर का किल्लारी भूकंप बना भारत के आपदा प्रबंधन का टर्निंग पॉइंट

Latur Earthquake 1993: 33 साल पहले लातूर के किल्लारी में आए 47 सेकंड के विनाशकारी भूकंप ने हजारों जिंदगियां निगल ली थीं। जानिए कैसे इस त्रासदी के बाद राहत, बचाव और पुनर्वास का किल्लारी मॉडल तैयार हुआ।
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किल्लारी भूकंप (सोर्स: एआई फोटो)
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Killari Earthquake Disaster Management: 30 सितंबर 1993 का वह तड़का महाराष्ट्र के इतिहास में एक ऐसा जख्म छोड़ गया, जो आज 33 साल बाद भी हरा है। भोर के करीब 3:56 बजे, जब लातूर और धाराशिव (उस्मानाबाद) जिलों के ग्रामीण इलाके गणपति विसर्जन उत्सव की थकान के बाद गहरी नींद में सो रहे थे, तभी धरती के सीने में भीषण कंपन उठा।

रिक्टर पैमाने पर 6.2 से 6.4 तीव्रता वाले इस उथले भूकंप ने महज 47 सेकंड में 52 गांवों को पूरी तरह जमींदोज कर दिया और करीब 8,000 से 10,000 लोगों की जान ले ली।

शरद पवार की वह जागती रात

उस वक्त महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार मुंबई में गणपति विसर्जन की तैयारियों और सुरक्षा व्यवस्था पर रातभर नजर रख रहे थे। तड़के 3:45 बजे परभणी के पुलिस अधीक्षक का फोन आया कि विसर्जन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया है। पवार सोने ही वाले थे कि अचानक 3:55 बजे उनके कमरे की खिड़कियां और फर्नीचर जोर-जोर से हिलने लगे।

पवार ने तुरंत कोयना भूकंप निगरानी केंद्र से संपर्क किया, जहां से जानकारी मिली कि भूकंप का मुख्य केंद्र लातूर का किल्लारी गांव है। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए पवार ने बिना एक पल गंवाए अपने कैबिनेट सहयोगी व लातूर के तत्कालीन पालक मंत्री विलासराव देशमुख, धाराशिव के पालक मंत्री डॉ. पद्मसिंह पाटिल और मुख्य सचिव को तड़के ही जगाया। सुबह 6 बजे ही वायुसेना के विमान को तैयार करवाकर मंत्रियों व वरिष्ठ अधिकारियों की टीम को तुरंत लातूर के लिए रवाना कर दिया गया।

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भूकंप के बाद शरद पवार और विलासराव देशमुख(सोर्स: सोशल मीडिया)

लातूर के बेटे विलासराव देशमुख और ज़मीनी मोर्चा

लातूर की माटी से ताल्लुक रखने वाले विलासराव देशमुख के लिए यह आपदा केवल एक प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि एक गहरा व्यक्तिगत और भावनात्मक आघात थी। 30 सितंबर की सुबह जब मंत्रियों की टीम घटनास्थल पर पहुंची, तो चारों तरफ बिखरी लाशें, मलबे के ढेर और परिजनों का चीत्कार देखकर हर किसी का कलेजा कांप उठा।

तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार खुद लगातार 15 दिनों तक सोलापुर के सर्किट हाउस में डटे रहे ताकि राहत व बचाव अभियानों की सीधी निगरानी की जा सके। वहीं, लातूर के जननेता विलासराव देशमुख और जिला परिषद अध्यक्ष दिलीपराव देशमुख ने कई महीनों तक आपदाग्रस्त इलाकों में रहकर हर पीड़ित परिवार तक राशन, तिरपाल, कपड़े और चिकित्सा सहायता पहुंचाने के कार्य को गति दी।

प्रशासनिक मशीनरी पर अतिरिक्त दबाव न पड़े, इसके लिए शरद पवार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव से भी अनुरोध किया कि वे अपना दौरा कुछ दिन टाल दें, ताकि पूरा प्रशासनिक अमला वीआईपी प्रोटोकॉल में उलझने के बजाय सिर्फ और सिर्फ राहत कार्य में जुटा रहे। इसके साथ ही, तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के सहयोग से महज 10 दिनों के भीतर विश्व बैंक से पुनर्वास के लिए वित्तीय सहायता मंजूर कराई गई।

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मलबे में दबी चीखें और दिल दहला देने वाली दास्तानें

राहत कार्यों के बीच इंसानी दर्द की ऐसी कहानियां सामने आईं, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। किल्लारी के अप्पाराव कुराले के मिट्टी के मकान की छत गिर जाने से वे 7 घंटे तक गर्दन तक मिट्टी में दबे रहे। वे तो किसी तरह जिंदा निकल आए, लेकिन उनकी पत्नी, चार मासूम बच्चे, माता-पिता और भाई पूरा परिवार इस त्रासदी की भेंट चढ़ गया।

शरद भोसले, जो उस समय लातूर शहर में पढ़ाई कर रहे थे, खबर मिलते ही जब गांव पहुंचे तो उनका पूरा संसार उजड़ चुका था; उन्होंने अपने पिता, चाचा और चचेरे भाइयों समेत 9 सदस्यों को खो दिया।

सास्तुर गांव, जहां सबसे अधिक करीब 1,200 लोगों की मौत हुई, वहां के विजयकुमार क्षीरसागर ने अपने भाई, भाभी और मात्र 2 साल के भतीजे को हमेशा के लिए खो दिया।

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आपदा प्रबंधन का ऐतिहासिक किल्लारी मॉडल

किल्लारी भूकंप के दौरान जिस गति, संवेदना और जन-भागीदारी के साथ राहत व पुनर्वास का काम किया गया, उसने भारत में आपदा प्रबंधन की पूरी अवधारणा को हमेशा के लिए बदल दिया। किल्लारी के इसी मॉडल के आधार पर आगे चलकर देश में आपदा प्रबंधन अधिनियम (2005) और NDRF जैसी संस्थागत संरचनाओं की नींव पड़ी।

आज 33 साल बीत जाने के बाद भी, लातूर के पुनर्निर्मित गांवों में रहने वाले बुजुर्ग और उत्तरजीवी उस भयानक रात के खौफ और अपनों को खोने के दर्द से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं।

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