सीएम फडणवीस ने दिया बीमार बैल, अब फिर बैल की जगह पत्नी जोतेगी खेत? कम नहीं हो रही किसान की मुश्किलें

Devendra Fadnavis Sick Bull Controversy: लातूर में सीएम फडणवीस की मदद बनी आफत! किसान को मिला बीमार बैल, हल जोड़ते ही गिरा। विपक्ष ने घेरा, बुवाई सीजन में बढ़ी अन्नदाता की मुश्किलें। पढ़ें पूरी रिपोर्ट
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किसान को मिला बीमार बैल (सोर्स: सोशल मीडिया)
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CM Devendra Fadnavis Gives Sick Bull: लातूर का वह गरीब किसान, जिसे मुख्यमंत्री फडणवीस ने बैल दिलाकर मदद की थी और जिसकी वजह से उन्होंने काफी तारीफ भी बटोरी थी, आज उस कहानी में एक नया मोड़ आ गया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई मदद की गुहार ने प्रशासन को जगाया तो सही, लेकिन वही मदद अब किसान के लिए एक नई मुसीबत बन गई है।

मजबूरी की तस्वीर और वायरल वीडियो

लातूर जिले के देवनी तालुका के बोंबली गांव में रहने वाले काशीनाथ गायकवाड, जो एक भूमिहीन खेतिहर मजदूर हैं, बटाई पर खेती कर अपने छह बच्चों का पेट पालते हैं। हाल ही में बेमौसम बारिश के दौरान बिजली गिरने से उनके बैल की मौत हो गई। बुवाई का समय नजदीक था और नया बैल खरीदने के पैसे नहीं थे, इसलिए मजबूरी में काशीनाथ की पत्नी हौसाबाई ने खुद बैल की जगह जुए को अपने कंधे पर रख लिया और अपने पति के साथ खेत जोतने लगीं। इस हृदयविदारक दृश्य का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिससे पूरे महाराष्ट्र में दुख की लहर दौड़ गई।

मुख्यमंत्री का हस्तक्षेप या सरकारी दिखावा?

वीडियो वायरल होने के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने प्रशासन को तुरंत मदद के निर्देश दिए। 10 जून को आनन-फानन में तहसील कार्यालय के अधिकारियों ने एक स्थानीय गौशाला से एक बैल का इंतजाम किया और उसे गायकवाड परिवार को सौंप दिया। परिजनों का आरोप है कि अधिकारियों का ध्यान मदद से ज्यादा औपचारिकता पूरी करने पर था; उन्होंने बैल को हल से जोड़ा, तस्वीरें और वीडियो बनवाए और चले गए।

मदद बनी मुसीबत: बीमार निकला सरकारी बैल

असली समस्या तब शुरू हुई जब किसान ने उस बैल के साथ काम करना शुरू किया। वह बैल इतना कमजोर और कुपोषित था कि खेत में काम करना तो दूर, वह हल से जुड़ते ही जमीन पर गिर पड़ा। पशु चिकित्सा अधिकारियों ने जांच के बाद पुष्टि की कि बैल में खेती करने की शारीरिक शक्ति ही नहीं है। अब उस गरीब किसान को खेत जोतने के बजाय उस बीमार बैल के इलाज और खुराक पर खर्च करना पड़ रहा है।

देर से मिली वित्तीय सहायता और बाजार की मार

जब यह मामला दोबारा सुर्खियों में आया, तो प्रशासन ने अपनी गलती सुधारने की कोशिश की। किसान को पहले मिली 32,000 रुपये की मदद के अलावा, नया बैल खरीदने के लिए 50,000 रुपये नकद और दिए गए। लेकिन यहाँ भी समय ने किसान का साथ नहीं दिया। लातूर में बैलों का साप्ताहिक बाजार मंगलवार को लगता है, और जब तक पैसा किसान के हाथ में पहुँचा, बाजार का दिन निकल चुका था। इस कारण बुवाई के महत्वपूर्ण समय में भी किसान नया बैल नहीं खरीद सका।

विपक्षी नेताओं का हमला

इस घटना को लेकर विपक्षी नेताओं ने सरकार की कड़ी आलोचना की है। कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार, रोहिणी खडसे और रोहित पवार ने आरोप लगाया कि सरकार ने केवल सोशल मीडिया के दबाव और शोबाज़ी के लिए बीमार बैल थमाकर किसान के साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा कि अन्नदाता को दी जाने वाली मदद सम्मान के साथ और बिना किसी दिखावे के दी जानी चाहिए।

वर्तमान में, काशीनाथ गायकवाड अगले मंगलवार के बाजार का इंतजार कर रहे हैं ताकि वे एक सक्षम बैल खरीद सकें और अपनी खेती शुरू कर सकें। तब तक, सरकारी मदद उनके घर के आंगन में एक बीमार बोझ बनकर खड़ी है।

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