

कोल्हापुर के गोकुल दूध संघ चुनाव में महायुति और विपक्ष आमने-सामने हैं।
अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर कोरम और राजनीतिक गतिरोध लगातार बना हुआ है।
पांच नए सरकारी निदेशकों की नियुक्ति के प्रस्ताव से विवाद और बढ़ गया है।
Kolhapur Gokul Dairy Elections Importance: महाराष्ट्र के कोल्हापुर में एक दूध संघ के चुनाव ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। मामला सिर्फ अध्यक्ष की कुर्सी का नहीं, बल्कि करीब 4,000 करोड़ रुपये के कारोबार वाली सहकारी संस्था के नियंत्रण का है। गोकुल दूध संघ के चुनाव में सतेज पाटिल समर्थित पैनल को 13 और महायुति समर्थित पैनल को 12 सीटें मिलीं।
इसके बाद अध्यक्ष चुनाव में कोरम का विवाद उठा और अब पांच सरकारी प्रतिनिधियों की नियुक्ति के प्रस्ताव ने राजनीतिक टकराव को और बढ़ा दिया है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से लेकर राहुल गांधी तक इस मुद्दे पर बयान दे रहे हैं।
16 मार्च 1963 को स्थापित कोल्हापुर जिला सहकारी दूध उत्पादक संघ को गोकुल ब्रांड के नाम से जाना जाता है। संघ की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में इसका टर्नओवर 4,185 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यह आंकड़ा फिलहाल प्रोविजनल है। गोकुल के मुख्य डेयरी प्लांट की क्षमता 17 लाख लीटर प्रतिदिन है।
2025-26 में औसतन 16.24 लाख लीटर दूध रोजाना संकलित किया गया। इसके नेटवर्क में 8,461 गांव-स्तरीय दुग्ध सहकारी संस्थाएं शामिल हैं। संघ के मुताबिक, बिक्री से मिलने वाले प्रत्येक रुपये का 76 से 82 फीसदी हिस्सा दूध उत्पादकों को कीमत और सेवाओं के रूप में लौटाया जाता है। ऐसे में गोकुल का प्रभाव सिर्फ डेयरी कारोबार तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है।
19 अक्टूबर को हुए चुनाव में सतेज पाटिल समर्थित राजर्षि शाहू शेतकरी समविचारी आघाड़ी ने 25 में से 13 सीटें जीतीं, जबकि महायुति समर्थित पैनल को 12 सीटें मिलीं। लेकिन अध्यक्ष चुनने के लिए गोकुल के उपनियमों के मुताबिक 14 निदेशकों का कोरम जरूरी है। 29 अक्टूबर को महायुति के सभी 12 निदेशक बैठक में शामिल नहीं हुए। इस कारण बैठक स्थगित करनी पड़ी।
इसके बाद 13 निदेशकों ने अलग बैठक में शशिकांत पाटिल चुएकर को अध्यक्ष चुने जाने की घोषणा की, लेकिन डेयरी प्रशासन ने इस फैसले को मान्यता नहीं दी। बॉम्बे हाई कोर्ट की कोल्हापुर सर्किट बेंच ने 2 नवंबर को सभी 25 निदेशकों को नोटिस देकर 10 नवंबर को नई बैठक कराने का निर्देश दिया।
इस विवाद के बीच महाराष्ट्र मंत्रिमंडल ने 500 करोड़ रुपये से अधिक सालाना कारोबार वाली बड़ी सहकारी संस्थाओं में पांच सरकारी प्रतिनिधि नियुक्त करने के लिए कानून में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दी। इनमें चार विशेषज्ञ निदेशक होंगे, जिन्हें अध्यक्ष के चुनाव में मतदान का अधिकार देने का प्रस्ताव है। पांचवां प्रतिनिधि उपनिबंधक स्तर का अधिकारी होगा, जिसे मतदान का अधिकार नहीं होगा।
ये विशेषज्ञ निदेशक अध्यक्ष पद का चुनाव भी नहीं लड़ सकेंगे। यदि चारों मतदान अधिकार वाले निदेशक महायुति के पक्ष में जाते हैं, तो उसके 12 वोट बढ़कर 16 हो सकते हैं, जबकि सतेज पाटिल के पैनल के पास 13 निर्वाचित निदेशक हैं। हालांकि, यह केवल संभावित गणित है। कैबिनेट की मंजूरी को कानून लागू हो जाने के बराबर नहीं माना जा सकता।
गोकुल चुनाव में महायुति की ओर से कई मंत्री, सांसद और विधायक सक्रिय थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी महायुति के घटक दलों को एक साथ लाने में भूमिका निभाई थी। चुनाव में हार के बाद सरकारी मनोनीत निदेशकों के प्रस्ताव को लेकर विपक्ष ने सरकार पर जनादेश बदलने की कोशिश का आरोप लगाया।
सतेज पाटिल ने इस फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने और आंदोलन का ऐलान किया है। वहीं, राहुल गांधी ने सरकारी निदेशकों की नियुक्ति के फैसले को दूध उत्पादकों के वोटों की 'वोटचोरी' और जनादेश में 'मिलावट' करार दिया। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि बड़े सहकारी संस्थानों में पारदर्शिता, पेशेवर प्रबंधन और वित्तीय जवाबदेही बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है।
गोकुल का कारोबार, दूध उत्पादकों का विशाल नेटवर्क और पश्चिमी महाराष्ट्र की सहकारी राजनीति में इसका प्रभाव इसे बेहद महत्वपूर्ण बनाते हैं। इस संस्था पर नियंत्रण का अर्थ ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े बड़े नेटवर्क में राजनीतिक प्रभाव भी है। इसलिए यह विवाद अब 13 बनाम 12 सीटों की लड़ाई से आगे बढ़कर सहकारी संस्थाओं की स्वायत्तता, निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकार और सरकार की भूमिका का सवाल बन गया है।
10 नवंबर की बैठक और प्रस्तावित कानूनी बदलाव पर आगे होने वाली कार्रवाई तय करेगी कि गोकुल की सत्ता का गणित किस दिशा में जाता है।