

Dhule Sand Mining Controversy: धुले जिले की पांझरा नदी इन दिनों जीवन नहीं, बल्कि 'लूट का जरिया' बनती नजर आ रही है। न्याहलोद क्षेत्र में नदी पात्र की नीलामी ने प्रशासन की भूमिका को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
आरोप है कि ग्राम पंचायत को अंधेरे में रखकर यह फैसला लिया गया, जबकि इसका सीधा असर 8 गांवों की जल व्यवस्था पर पड़ने वाला है। अब सवाल उठ रहे हैं कि राजस्व के लिए क्या प्रशासन जनता की प्यास गिरवी रख रहा है? जिसके प्रति जिला प्रशासन उदासीन बना हुआ है।
रेत माफिया का दबदबा?
इस गोरख धंधे में राजस्व पुलिस के साथी नेता मंडली मोटी कमाई कर रहे हैं। ग्रामीणों ने रेत खनन और परिवहन पर नकेल कसने जिलाधिकारी कार्यालय में ज्ञापन सौंपा है, 8 गांव की बुझाती है प्यास नियमों के मुताबिक, नदी से रेत खनन से पहले ग्रामसभा की अनुमति जरूरी होती है, लेकिन यहां नियमों को खुलेआम दरकिनार कर दिया गया।
न्वाहलोद ग्राम पंचायत की सहमति के बिना ही नीलामी की प्रक्रिया पूरी कर दी गई। इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं इस पूरे खेल के पीछे 'रेत माफिया का दबदबा तो नहीं? न्याहलोद, कुंडाणे, सातरणे, धमाणे, नगांव, विश्वनाथ, सुकवड और कौठल इन आठ गांवों को जीवनरेखा पांझरा नदी ही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, नदी की रेत भूजल का प्राकृतिक भंडार होती है। यदि इसे अंधाधुंध निकाला गया, तो विहीरे सूख जाएंगी और भूजल स्तर तेजी से नीचे बला जाएगा।
इसका सीधा असर किसानों की फसलों और गांवों की प्यास पर पड़ेगा स्थिति और गंभीर इसलिए है। क्योंकि इन गांवों की पेयजल योजनाएं भी इसी नदी पर आधारित है।
अगर रेत हट गई, तो पानी का स्रोत खत्म हो जाएगा और गांवों को टैंकर के भरोसे जीना पड़ेगा। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या प्रशासन इस संभावित संकट की जिम्मेदारी लेने को तैयार है? ग्रामीणों ने इस निर्णय के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सरपंच ने जिला प्रशासन को ज्ञापन देकर साफ चेतावनी दी है कि यदि नीलामी रद्द नहीं हुई, ती आंदोलन छेड़ा जाएगा।