जहांगीर का 12 किलो का सोने का सिक्का! शिवराई से मुगलकाल तक;2600 साल पुरानी मुद्राओं की संभाजीनगर में प्रदर्शनी

Sambhajinagar Ancient Coin Walk: छत्रपति संभाजीनगर में एमजीएम विश्वविद्यालय की कॉइन गैलरी में हेरिटेज वॉक। नागरिकों ने शिवराई, सातवाहन और मुगलकालीन सिक्कों का 2600 साल पुराना इतिहास जाना।
Sambhajinagar MGM University Coin Gallery Heritage Walk
संभाजीनगर प्राचीन सिक्का सोर्स: सोशल मीडिया
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Highlights

  • एमजीएम विश्वविद्यालय की अन्नासाहेब टाकलगव्हाणकर कॉइन गैलरी में हेरिटेज वॉक का आयोजन।

  • पुरातत्वविद् प्रो. आशुतोष पाटील ने 2600 साल के सिक्कों का इतिहास बताया।

  • छत्रपति शिवाजी महाराज के शिवराई सिक्के 1950 तक महाराष्ट्र में प्रचलन में थे।

  • सातवाहन रानी नागनिका ने अपने नाम से सिक्के जारी किए थे।

  • मुगल बादशाह जहांगीर ने 12 किलो वजन का सोने का सिक्का बनवाया था।

  • कार्यक्रम में दूरबीन से सूर्य दर्शन की सुविधा भी दी गई।

Sambhajinagar MGM University Coin Gallery Heritage Walk: छत्रपति संभाजीनगर में एमजीएम विश्वविद्यालय की अन्नासाहेब टाकलगव्हाणकर कॉइन गैलरी में आयोजित हेरिटेज वॉक के दौरान नागरिकों को भारत के करीब 2600 साल पुराने सिक्कों के इतिहास से परिचित कराया गया। पुरातत्वविद् प्रो. आशुतोष पाटील ने शिवराई, सातवाहन, कुषाण, मुगल और ब्रिटिश काल की मुद्राओं की विशेषताएं बताईं। उन्होंने बताया कि जहांगीर ने 12 किलो वजन का सोने का सिक्का बनवाया था, जबकि शिवराई सिक्के 1950 तक प्रचलन में थे।

सिक्कों में दर्ज है 2600 साल का इतिहास

छत्रपति संभाजीनगर, सिक्के केवल खरीदारी और लेन-देन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे किसी दौर की सत्ता, संस्कृति, व्यापार और सामाजिक जीवन की कहानी भी बयां करते हैं। भारत में मुद्रा का यह सफर करीब 2600 साल पुराना है। इसी ऐतिहासिक विरासत से नागरिकों को रूबरू कराने के लिए एमजीएम विश्वविद्यालय की अन्नासाहेब टाकलगव्हाणकर कॉइन गैलरी में हेरिटेज वॉक का आयोजन किया गया। इसमें शिवराई से लेकर मुगलकालीन और ब्रिटिश दौर की मुद्राओं तक का इतिहास बताया गया।

कौड़ियों से शुरू हुआ मुद्रा का सफर

कार्यक्रम में पुरातत्वविद् प्रो. आशुतोष पाटील ने सिक्कों के विकास की जानकारी रोचक अंदाज में दी। उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में वस्तुओं के बदले वस्तुओं का लेन-देन किया जाता था। अनाज, पशु, कौड़ियां और पशुओं की खाल जैसी चीजें विनिमय का माध्यम थीं। बाद में धातुओं का इस्तेमाल मुद्रा के रूप में होने लगा। भारत में छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास सिक्कों का चलन शुरू हुआ।

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शिवराई सिक्के 1950 तक प्रचलन में

प्रो. पाटील ने इंडो-ग्रीक, रोमन, मौर्य, कुषाण, गुप्त, सातवाहन, चोल, विजयनगर, शिवकालीन, मुगल और ब्रिटिश काल के सिक्कों की विशेषताएं बताईं। उन्होंने बताया कि छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल में जारी किए गए शिवराई सिक्के महाराष्ट्र में 1950 तक प्रचलन में थे।

सातवाहन काल की रानी नागनिका ने अपने नाम से सिक्के जारी किए थे। वहीं, महमूद गजनवी ने देवनागरी लिपि वाले सिक्के चलाए थे। ये उदाहरण बताते हैं कि अलग-अलग राजवंशों ने अपनी सत्ता और पहचान को मुद्रा के माध्यम से भी स्थापित किया।

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12 किलो का था जहांगीर का सोने का सिक्का

भारतीय सिक्कों के इतिहास में मुगलकाल की मुद्राओं का भी विशेष स्थान रहा है। प्रो. पाटील ने बताया कि मुगल बादशाह जहांगीर ने नजराने के लिए 12 किलो वजन का सोने का सिक्का बनवाया था। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि भारत में सबसे पहले सोने के सिक्के कुषाण शासकों ने जारी किए थे।

इतिहास के साथ सूर्य दर्शन

इस हेरिटेज वॉक का आयोजन एमजीएम विश्वविद्यालय के इतिहास एवं पुरातत्व विभाग, आख्यान फाउंडेशन, गरवारे कम्युनिटी सेंटर, एडगाइड मीडिया, केंद्रीय पर्यटन विभाग और टीम 'शहरनामा' की ओर से किया गया था।

कार्यक्रम के दौरान एमजीएम के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम एस्ट्रोस्पेस साइंस सेंटर एंड क्लब की ओर से दूरबीन के माध्यम से सूर्य दर्शन की व्यवस्था भी की गई। इस अवसर पर सुनील सुतवणे, रमाकांत रौतल्ले, ओम परदेशी, श्रीनिवास औंधकर, संजय टाकलगव्हाणकर और प्रवीण देशमुख सहित अन्य उपस्थित थे।