भंडारा के 12 हजार हेक्टेयर जंगल पर आग और शिकार का साया; मानव-वन्यजीव संघर्ष में करोड़ों का नुकसान

भंडारा जिले में 12,587 हेक्टर वनक्षेत्र पर मंडरा रहा खतरा, जंगल की आग और मानव-वन्यजीव संघर्ष की समस्या।
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Bhandara Forest News: भंडारा तालाबों के जिले के रूप में पहचाने जाने वाले भंडारा के लिए 21 मार्च का विश्व वन दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि गंभीर आत्मचिंतन का अवसर बन गया है। जिले के भंडारा, पवनी, साकोली, तुमसर और लाखांदुर क्षेत्रों में फैला करीब 12,587 हेक्टेयर वनक्षेत्र इस समय आग, शिकार और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसे तीनहरे संकट से जूझ रहा है।

गर्मी की शुरुआत के साथ मार्च से जून का कालखंड वन विभाग के लिए सबसे कठिन माना जाता है। महुआ फूल और तेंदूपत्ता संकलन के दौरान जमीन साफ करने के लिए लगाई जाने वाली आग कई बार विकराल रूप ले लेती है। इससे न सिर्फ बहुमूल्य वन संपदा नष्ट होती है, बल्कि शासन को मिलने वाला करोड़ों का राजस्व और स्थानीय मजदूरों की आजीविका भी प्रभावित होती है। विभाग ने ब्लोअर मशीन और जियोटैगिंग जैसी तकनीकों का उपयोग शुरू किया है, फिर भी दुर्गम इलाकों में आग पर नियंत्रण बड़ी चुनौती बना हुआ है।

जिले में स्थित कोका अभयारण्य और उमरेड-पवनी-करहांडला अभयारण्य के कारण बाघ, तेंदुए और नीलगाय जैसे वन्यजीवों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2025 की गणना के अनुसार जिले में 2,691 वन्यजीव दर्ज किए गए हैं। हालांकि, वनक्षेत्र के सिकुड़ने से ये वन्यजीव अब मानव बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं।

1 अप्रैल 2025 से अब तक जिले में 6,417 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें 3 लोगों की मृत्यु, 42 लोग घायल और 814 मवेशियों की मौत हुई है। इन घटनाओं के मुआवजे के रूप में सरकार को 7.33 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करना पड़ा है।

गर्मी में प्राकृतिक जलस्रोत सूखने के कारण वन्यजीव पानी की तलाश में बाहर निकलते हैं, जिसका फायदा शिकारी उठाते हैं। बिजली के तार बिछाकर या जलस्रोतों के पास जाल लगाकर शिकार करने की घटनाएं चिंता बढ़ा रही हैं। ट्रैप कैमरे लगाए गए हैं, लेकिन विशाल वनक्षेत्र की तुलना में वनकर्मियों की संख्या अपर्याप्त है।

 आधुनिक तकनीक और जनभागीदारी जरूरी

भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत वनक्षेत्र के एक किलोमीटर के दायरे में आग लगाना प्रतिबंधित है। खेतों का कचरा जलाने से पहले वन विभाग को सूचना देना अनिवार्य है, अन्यथा जेल और जुर्माने का प्रावधान है।

विशेषज्ञों का मानना है कि संयुक्त वन प्रबंधन समितियों और ग्रामसभाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना जंगलों का संरक्षण संभव नहीं है। विश्व वन दिवस पर केवल पौधारोपण तक सीमित रहने के बजाय दीर्घकालिक और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।

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