फिर आंदोलन पर बैठेंगे मनोज जरांगे! दशहरा रैली में रखी ये मांग, महाराष्ट्र सरकार को दी चेतावनी

Maharashtra: मनोज जरांगे पाटिल ने गुरुवार को नारायण गढ़ में दशहरा रैली को संबोधित किया। इस रैली के दौरान उन्होंने महाराष्ट्र सरकार को वापस से आंदोलन पर बैठने की चेतावनी दी और अपनी मांगे रखी।
Maharashtra: मनोज जरांगे पाटिल ने गुरुवार को नारायण गढ़ में दशहरा रैली को संबोधित किया। इस रैली के दौरान उन्होंने महाराष्ट्र सरकार को वापस से आंदोलन पर बैठने की चेतावनी दी और अपनी मांगे रखी।
मनोज जरांगे (सौजन्य-आईएएनएस)
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Manoj Jarange: बीड संभाग में मराठा नेता मनोज जरांगे पाटिल ने आरक्षण का मुद्दा उठाने के बाद अब किसानों के मुद्दे को लेकर आक्रामक रुख अपना लिया है। उन्होंने महाराष्ट्र में बाढ़ से हुए नुकसान के बाद राज्य में गीला सूखा घोषित करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि मराठवाड़ा के किसानों को बारिश से काफी नुकसान हुआ है।

इस वजह से किसानों का कर्ज माफ किया जाना चाहिए, जरांगे पाटिल गुरुवार को नारायण गढ़ में दशहरा रैली को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मैं सरकार से सार्वजनिक रूप से कह रहा हूं कि मराठवाड़ा और उससे सटे जिलों में दिवाली से पहले सूखा घोषित किया जाना चाहिए।

100% मुआवजे की मांग

साथ ही किसानों को 70 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर सहायता राशि दी जानी चाहिए, जिन किसानों के फसल के खेत की जमीन बह गई है, उन्हें 1 लाख 30 हजार रुपये मुआवजा दिया जाए, जिन किसानों को व्यापक नुकसान हुआ है, उन्हें 100% मुआवजा दिया जाए।

सरकार से प्रमुख मांगें

  • किसानों को उनकी उपज का गारंटीशुदा दाम दिया जाए।
  • फसल बीमा से जुड़ी बाध्यताएं दूर की जाएं।
  • सरकार किसानों का पूरा कर्ज माफ करे।
  • आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को सरकारी नौकरी दी जाए।
  • अगर सरकार सहायता नहीं देती है, तो हम फिर आंदोलन करेंगे।

मराठा समाज के हितों से कोई समझौता नहीं

जरांगे पाटिल ने अपने समर्थकों से भावुक अंदाज में कहा कि मैं अब कम दिनों का मेहमान रहूं या लंबे समय तक का रहूं। अब मुझे कोई चिंता नहीं है। मराठा समाज के हितों के लिए मुझे जो करना था, मैने किया। मैंने अपने समुदाय से कभी झूठ नहीं बोला।

यह सच है कि कभी-कभी मैं एक-दो कदम आगे या पीछे हट गया होगा, लेकिन मराठा समाज के हितों से कोई समझौता नहीं की। मैने देखा कि मराठा समाज के बच्चे काफी मुश्किल से अपना जीवन जी रहे हैं। ऐसे में कृषि के साथ-साथ आरक्षण का सहारा जरूरी है।

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