अली खामेनेई के जनाजे में शामिल होगा भारतीय प्रतिनिधिमंडल (सोर्स- सोशल मीडिया)  
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Explainer: खामेनेई के जनाजे में क्यों शामिल नहीं हो रहे PM मोदी? जानिए क्या है भारत की 'डेलिगेशन' डिप्लोमेसी

Ayatollah Khamenei Funeral: अयातुल्ला खामेनेई के जनाजे में भारत ने पीएम मोदी या विदेश मंत्री की जगह सैयद अता हसनैन और पबित्र मार्गरिटा का संतुलित प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया है।

अक्षय साहू

Indian Delegation Ayatollah Khamenei Funeral: ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन 131 दिन के बाद उनके सम्मान में राजकीय जनाजे का आयोजन किया जाने वाला है। यह कार्यक्रम 4 जुलाई से शुरू होकर 9 जुलाई तक चलेगा। ईरान ने इस कार्यक्रम के लिए दुनियाभर के नेताओं और प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है। भारत को भी इसके लिए निमंत्रण मिला, जिसे भारत ने स्वीकार भी कर लिया है।

माना जा रहा था कि ओर से इस कार्यक्रम में विदेश मंत्री डॉ.एस जयशंकर शामिल हो सकते हैं। जैसे बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के निधन के समय किया गया था, लेकिन सरकार ने जयशंकर को भेजने की जगह छोटा और संतुलित प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया। हालांकि, इस फैसले को लेकर अब कई तरह के सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या भारत युद्ध खत्म होने के बाद भी ईरान से दूरी बना रहा है? भारत ने ईरान में प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला क्यों किया? प्रतिनिधिमंडल में कौन-कौन शामिल है?

प्रतिनिधिमंडल में कौन-कौन शामिल?

अयातुल्ला अली खामेनेई के जनाजे में भारत की ओर से ईरान जाने वालों में बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गरिटा का नाम शामिल है। सरकार ने इन दोनों का चयन काफी सोच समझकर किया है। सबसे पहले बात करते हैं सैयद अता हसनैन की। हसनैन एक सम्मानित पूर्व सैन्य अधिकारी हैं, इसके अलावा शिया मुस्लिम समुदाय से आते हैं। क्योंकि ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया बहुल देश है। ऐसे में हसनैन का चयन एक मास्टर स्ट्रोक से कम नहीं है।

खामेनेई के जनाजे में शामिल होंगे बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन (सोर्स- सोशल मीडिया)

खामेनेई के जनाजे में भारत की ओर से एक शिया प्रतिनिधि का मौजूद रहना ईरान और शिया समुदाय के प्रति सम्मान का संदेश माना गया। वहीं, पबित्र मार्गरिटा इस कार्यक्रम में विदेश मंत्रालय का  प्रतिनिधित्व करते नजर आएंगे। मार्गरिटा के पास विदेश मामलों का एक लंबा अनुभव है जो यह बताता है कि भारत इस कार्यक्रम को लेकर कितना गंभीर है।

प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री क्यों नहीं हो रहे शामिल?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कार्यक्रम में शामिल नहीं होने को लेकर उनके पहले से तय व्यस्त कार्यक्रम को मान रहे हैं। पीएम मोदी सबसे पहले 1 से 3 जुलाई तक जपान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची की मेजबानी करेंगे। इसके बाद वो राजस्थान और फिर इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर जाएंगे। कुछ इसी प्रकार का व्यस्त कार्यक्रम विदेश मंत्री एस जयशंकर का भी है। हालांकि, दोनों वरिष्ठ नेताओं के ईरान न जाने के पीछे केवल व्यस्तता ही नहीं, बल्कि रणनीतिक सोच भी माना जा रहा है।

गुटनिरपेक्ष बनाए रखना चाहता है भारत (सोर्स- सोशल मीडिया)

जानकारों का मानना है कि अगर प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री इस जनाजे में शामिल होते तो कुछ देश इसे ईरान के राजनीतिक रुख का समर्थन मान सकते थे। भारत इस समय ऐसी किसी भी स्थिति से बचना चाहता है। खासकर तब जब अमेरिका के साथ भारत लंबे समय से व्यापार समझौते को लेकर बातचीत कर रहा है। इसके अलावा भारत की विदेश नीति हमेशा से ही किसी भी एक पक्ष में न रहकर गुटनिरपेक्ष रहने की रही है।

क्या ईरान से फिलहास दूरी बनाना चाहता है भारत?

भारत के लिए इस समय सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकार को एक साथ कई महत्वपूर्ण देशों से अपने संबंध बेहतर बनाए रखना है। इसमें ईरान के अलावा अमेरिका और इजरायल भी शामिल हैं। अमेरिका और इजरायल से भारत हर साल अरबों के आधुनिक हथियार खरीदता है। अमेरिका भारत का बड़ा व्यापारिक सहयोगी है। वहीं इजरायल रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में भारत का भरोसेमंद दोस्त माना जाता है। भारत इन देशों के साथ अपने मजबूत संबंध बनाए रखना चाहता है।

चाबहार बंदरगाह परियोजना में भारत ने किया है भारी निवेश (सोर्स- सोशल मीडिया)

जबकि भारत ने ईरान के कई प्रमुख विकास परियोजनाओं में पैसा लगाया है। ईरान भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अहम देश है। भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा होता है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस सप्लाई के लिए बहुत महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इसके अलावा चाबहार बंदरगाह परियोजना भी भारत के लिए रणनीतिक रूप से काफी अहम मानी जाती है। ऐसे में भारत किसी भी पक्ष को इस समय नाराज नहीं करना चाहता है। ऐसे में अगर प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री ईरान जाते तो अमेरिका और इजरायल को गलत संदेश जा सकता था। इसलिए भारत ने बहुत सोच समझकर प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया है।

फैसले के पीछे सामाजिक और सांस्कृतिक कारण

भारत के इस फैसले के पीछे सामाजिक और सांस्कृतिक का भी एक अहम कारण है। भारत में बड़ी संख्या में शिया समुदाय के लोग रहते हैं और उनके धार्मिक संबंध लंबे समय से ईरान के साथ हैं। ऐसे में सरकार ने प्रतिनिधिमंडल भेजकर न सिर्फ ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक रिश्ते के प्रति सम्मान जाहिर किया। बल्कि देश में रहने वाले शिया समुदाय के लोगों का भरोसा भी कायम रखने की कोशिश की है।

इसके अलावा खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ से अधिक भारतीय काम करते हैं। उनकी सुरक्षा और रोजगार के लिए भारत का यह कदम काफी महत्वपूर्ण हैं। भारत इस समय ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहता जिससे ईरान के साथ रिश्तों में नकारात्मक असर पड़े। यही कारण है कि सरकार हर कदम फूंक-फूंककर रख रही है।

भारत का यह फैसला देश की परिपक्व और व्यावहारिक विदेश नीति को दिखाता है। भारत ने एक ओर ईरान के प्रति सम्मान और संवेदना व्यक्त की, वहीं दूसरी ओर उसने यह भी सुनिश्चित किया कि उसके अमेरिका, इजरायल और खाड़ी देशों जैसे महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ संबंध प्रभावित न हों। इस तरह भारत ने एक ऐसा रास्ता चुना जिसमें किसी भी पक्ष की अनदेखी नहीं हुई। यह फैसला बताता है कि भारत की विदेश नीति भावनाओं के बजाय राष्ट्रीय हित, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक संतुलन को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।

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