बिना पुख्ता सबूत के 6 साल जेल में रहा शख्स, सुप्रीम कोर्ट ने बताया न्याय का मजाक; UP सरकार देगी मुआवजा

Supreme Court UP Police Investigation: सुप्रीम कोर्ट ने हत्या और अपहरण के मामले में छह साल जेल में रहे बरी व्यक्ति को यूपी सरकार से ₹6 लाख मुआवजा देने को कहा।
Supreme Court on UP Police
सुप्रीम कोर्ट Source- IANS
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Highlights

  • सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक महीने में ₹6 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया।

  • अपहरण और हत्या के मामले में आरोपी 6 साल जेल में रहने के बाद ट्रायल कोर्ट से बरी हुआ।

  • CCTV फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों में खामियों पर कोर्ट ने पुलिस जांच और अभियोजन को लेकर नाराजगी जताई।

Supreme Court compensation for six years in jail: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को अपहरण और हत्या के मामले में करीब छह साल तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहे एक व्यक्ति को 6 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है। ट्रायल कोर्ट ने बाद में उसे बरी कर दिया था। मामले की जांच और अभियोजन में गंभीर खामियां मिलने पर सर्वोच्च अदालत ने इसे ‘न्याय का मजाक’ करार दिया।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि पुलिस की लापरवाही भरी जांच और अभियोजन की अव्यवस्थित कार्यवाही के कारण एक व्यक्ति को छह साल जेल में बिताने पड़े। अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस को अपने अधिकारियों को जांच की सही प्रक्रिया के बारे में प्रशिक्षित करने के लिए भी आवश्यक कदम उठाने को कहा।

'अटकलों पर आधारित कहानी से बर्बाद हुए छह साल'

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महज संदेह और अटकलों पर आधारित एक मनगढ़ंत कहानी के कारण व्यक्ति की जिंदगी के छह साल बर्बाद हो गए, जबकि मामले में बुनियादी जांच तक ठीक से नहीं की गई थी।

पीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस का उद्देश्य किसी भी तरह आरोपी को दोषी ठहराना नहीं होना चाहिए। आपराधिक न्याय व्यवस्था में आरोपी तब तक निर्दोष माना जाता है, जब तक उसका अपराध साबित न हो जाए।

अदालत के मुताबिक, जांच और अभियोजन एजेंसियों को पीड़ित, शिकायतकर्ता और घायल व्यक्ति के साथ-साथ आरोपी के लिए भी न्याय सुनिश्चित करना चाहिए। पीठ ने कहा कि कई मामलों में अन्यायपूर्ण स्थिति सामने आती है, लेकिन कुछ मामलों में खामियां इतनी स्पष्ट और गंभीर होती हैं कि व्यवस्था के शिकार व्यक्ति को मुआवजा देना जरूरी हो जाता है।

FIR में नहीं था आरोपी का नाम

यह मामला अक्टूबर 2019 में उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में दर्ज एक FIR से जुड़ा है। इसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 364 यानी हत्या के उद्देश्य से अपहरण, धारा 302 यानी हत्या और धारा 201 यानी सबूत मिटाने के आरोप लगाए गए थे।

याचिकाकर्ता 14 नवंबर 2019 से हिरासत में था। उसका नाम न तो FIR में था और न ही दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 161 के तहत दर्ज शिकायतकर्ता के शुरुआती बयान में।

बाद में पुलिस ने CCTV फुटेज और सह-आरोपी के कथित कबूलनामे के आधार पर उसे मामले में आरोपी बनाया। सुनवाई के दौरान सह-आरोपी की मौत हो गई, जबकि एक अन्य आरोपी, जो याचिकाकर्ता की मां थी, फरार रही। इस मामले में याचिकाकर्ता ही एकमात्र आरोपी था, जिसका ट्रायल चला।

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मार्च 2026 में जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने लंबे समय से जेल में रहने और मामले के परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित होने को देखते हुए ट्रायल कोर्ट को तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया था। ट्रायल पूरा होने के बाद व्यक्ति को बरी कर दिया गया।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला मंगवाकर जांच की कि अभियोजन ने मामले को किस तरह आगे बढ़ाया था।

CCTV फुटेज पर उठाए सवाल

ट्रायल कोर्ट के फैसले का अध्ययन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जांच की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि जिस CCTV फुटेज के आधार पर याचिकाकर्ता को अपराध से जोड़ने की कोशिश की गई, वह स्पष्ट नहीं थी।

इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को अदालत में स्वीकार्य बनाने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B के तहत जरूरी प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत नहीं किया गया था।

पीठ ने यह भी गौर किया कि उपनिरीक्षक ने अपनी गवाही में स्पष्ट नहीं किया कि शिकायतकर्ता ने CCTV फुटेज के आधार पर आरोपियों की पहचान की थी या उन व्यक्तियों की, जो कथित तौर पर उसी दिन उसके पास आए थे।

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फिरौती मांगने के आरोप पर भी सवाल

अभियोजन ने याचिकाकर्ता पर फिरौती मांगने का आरोप भी लगाया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कथित फिरौती की मांग को लेकर पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी।

अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि तीन व्यक्तियों की पहचान आरोपियों के रूप में कैसे की गई और उन्हें किस आधार पर गिरफ्तार किया गया, जबकि किरावली तहसील की CCTV फुटेज को साक्ष्य के रूप में साबित ही नहीं किया गया था। इन खामियों के आधार पर पीठ ने जांच और अभियोजन की प्रक्रिया पर कड़ी नाराजगी जताई।

मुआवजा देने में देरी पर 18% ब्याज

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर 6 लाख रुपये का मुआवजा दे। निर्धारित समय में भुगतान नहीं होने पर इस राशि पर 18 प्रतिशत सालाना ब्याज देना होगा।

अदालत ने फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह सचिव को भेजने का भी निर्देश दिया, ताकि पुलिस अधिकारियों को जांच की उचित प्रक्रिया के बारे में प्रशिक्षित करने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकें।

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