

Skyroot Aerospace Vikram 1 Launch: साल 2002 में जब अमेरिकी बिजनेसमैन एलन मस्क ने स्पेस एक्स की नींव रखी थी, तब शायद ही किसी ने सोचा था कि अंतरिक्ष में रॉकेट भेजने का जो काम NASA और ISRO जैसी स्पेस एजेंसियां करती हैं, वहीं काम प्राइवेट कंपनियां करेंगी। या इससे पैसा भी कमाया जा सकता है। लेकिन आज 24 साल बाद दुनिया में एक-दो नहीं बल्कि 10,000 छोटी-बड़ी कंपनियां है जो स्पेस के क्षेत्र में काम कर रही है। अकेले भारत में ऐसी 400 कंपनियां हैं। इन्हीं में से एक कंपनी है स्काईरूट एयरोस्पेस, जिसने इतिहास रच दिया है। अमेरिका और चीन के बाद अब भारत दुनिया का तीसरा देश बन गया है, जहां किसी निजी कंपनी ने अपने दम पर ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया है। हैदराबाद की कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने विक्रम-1 रॉकेट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की कक्षा में पहुंचाकर यह उपलब्धि हासिल की। भारत में अब तक इस तरह के मिशन सिर्फ ISRO ही करता था। माना जा रहा है कि स्काईरूट भारत में वही भूमिका अदा कर सकती है जो अमेरिका के लिए स्पेस एक्स पिछले कुछ सालों से निभाता आ रहा है। आइए आपको इसी बहाने बताते हैं कि स्काईरूट ने इतनी बड़ी उपलब्धि कैसे हासिल की? इससे भारत को क्या फायदा होगा? यह कंपनी पैसे कैसे कमाती है और भविष्य में कंपनी के क्या प्लान हैं?
विक्रम-1 की सफलता सिर्फ एक रॉकेट लॉन्च नहीं है। इस मिशन ने दिखा दिया कि भारत की निजी कंपनियां भी अब अंतरिक्ष तकनीक में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। इससे ISRO को भी राहत मिलेगी, क्योंकि भविष्य में कई व्यावसायिक मिशन निजी कंपनियां संभाल सकेंगी। इससे भारत की ग्लोबल स्पेस इंडस्ट्री में भी मजबूत पहचान बनेगी।
रॉकेट बनाकर लॉन्च करना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन उसे सफल कारोबार में बदलना उससे भी बड़ी चुनौती है। स्काईरूट को लगातार नए ग्राहक, निवेश और नियमित लॉन्च की जरूरत होगी। अगर कंपनी लंबे समय तक लगातार मिशन नहीं करती, तो उसकी कमाई और विकास की रफ्तार प्रभावित हो सकती है। छोटे सैटेलाइट लॉन्च करने के बाजार में पहले से अमेरिका और चीन की कई निजी कंपनियां काम कर रही हैं। इन कंपनियों के पास अनुभव भी है और बड़े ग्राहक भी। ऐसे में स्काईरूट को कम लागत, भरोसेमंद तकनीक और समय पर लॉन्च जैसी खूबियों के दम पर अपनी जगह बनानी होगी।
स्काईरूट के लिए अच्छी खबर यह रही कि मई 2026 में कंपनी स्पेस-टेक यूनिकॉर्न बन गई। उसने करीब 60 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई और कंपनी का मूल्यांकन 9,000 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच गया। इससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा है और भविष्य में नई फंडिंग मिलने की संभावना भी मजबूत हुई है।
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना 2018 में पवन कुमार चंदना और नागा भारत डाका ने की थी। दोनों पहले ISRO में वैज्ञानिक थे। उन्होंने महसूस किया कि छोटे सैटेलाइट लॉन्च की लागत कम की जा सकती है। इसी सोच के साथ उन्होंने एक निजी स्पेस कंपनी शुरू की, जिसका मकसद अंतरिक्ष तक पहुंच आसान और सस्ती बनाना है।
विशेषज्ञों के मुताबिक केवल एक सफल मिशन काफी नहीं है। कंपनी को लगातार नए ग्राहक जोड़कर नियमित लॉन्च करने होंगे, तभी उसका कारोबार और कमाई टिकाऊ तरीके से बढ़ सकेगी।
भारत ने 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोला था। इसके बाद कई भारतीय स्टार्टअप इस क्षेत्र में तेजी से आगे आए हैं। स्काईरूट की सफलता इस बात का संकेत है कि आने वाले वर्षों में भारत का निजी स्पेस सेक्टर दुनिया के बड़े खिलाड़ियों में शामिल हो सकता है।