जयंती विशेष: 1935 में की घोषणा, 3 लाख लोगों का मिला साथ, क्यों डॉ. अंबेडकर ने अपनाया बौद्ध धर्म?

Dr. BR Ambedkar Jayanti Special: क्यों बाबासाहेब ने कहा था कि मैं हिंदू पैदा हुआ पर हिंदू मरूंगा नहीं? जानें उनके ऐतिहासिक धर्म परिवर्तन और सिद्धांतों की पूरी कहानी।
Dr. BR Ambedkar Jayanti Special
डॉ भीमराव अंबेडकर (सोर्स- सोशल मीडिया)
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Why DR. BR Ambedkar Converted In Buddhism: 14 अप्रैल को भारत के महान संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर की जयंती पूरे देश में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाती है। समाज के कमजोर वर्गों, मजदूरों और महिलाओं को अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया। ऐसा बताया जाता है कि निचले तबके में जन्म लेने की वजह से उन्हें बचपन से ही भेदभाव का सामना करना पड़ा, जिसने उनके अंदर सामाजिक बदलाव की मजबूत नींव रखी।

1935 में की ऐतिहासिक घोषण

डॉ. भीमराव अंबेडकर का जीवन जाति व्यवस्था के खिलाफ एक निरंतर संघर्ष रहा। उन्होंने न केवल सामाजिक स्तर पर बल्कि कानूनी रूप से भी इस भेदभाव को खत्म करने की लड़ाई लड़ी। उनका मानना था कि हिंदू धर्म में व्याप्त वर्ण व्यवस्था समानता और स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। 13 अक्टूबर 1935 को उन्होंने ऐतिहासिक घोषणा करते हुए कहा था कि वह हिंदू धर्म छोड़ने का निर्णय ले चुके हैं। उनके अनुसार, धर्म वह होना चाहिए जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का मार्ग दिखाए।

क्यों चुना बौद्ध धर्म?

लंबे संघर्ष और प्रयासों के बावजूद जब उन्हें लगा कि हिंदू धर्म में जाति प्रथा और छुआछूत जैसी कुरीतियों को समाप्त करना संभव नहीं है, तब उन्होंने धर्म परिवर्तन का निर्णय लिया। 14 अक्टूबर 1956 को दीक्षाभूमि में उन्होंने अपने लगभग 3.65 लाख समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया। उनका मानना था कि बौद्ध धर्म प्रज्ञा (समझदारी), करुणा (दया) और समता (बराबरी) का संदेश देता है, जो एक सम्मानजनक जीवन के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने कहा था कि मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ हूं लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं जो उनके आत्मसम्मान और सामाजिक बदलाव के संकल्प को दर्शाता है।

DR Ambedkar
DR Ambedkar (Source: Global Ambedkarites)

प्रज्ञा, करुणा और समता का संदेश

डॉ. भीमराव अंबेडकर के अनुसार, प्रज्ञा का अर्थ है अंधविश्वास और अवैज्ञानिक सोच से दूर रहना, करुणा का मतलब है पीड़ितों के प्रति संवेदना रखना, और समता का अर्थ है हर व्यक्ति को बराबरी का अधिकार देना। यही तीन सिद्धांत उनके विचारों की आधारशिला बने। आज भी अंबेडकर के ये विचार समाज के लिए प्रेरणा हैं और हमें एक समान, न्यायपूर्ण और समावेशी भारत की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग दिखाते हैं।

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