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अशोक लवासा ने आरोप लगाया कि SIR में शक के आधार पर वोटरों के नाम हटाए जा रहे हैं।
पूर्व चुनाव आयुक्त ने ECINET तक EROs की पहुंच पर भी सवाल उठाए।
चुनाव आयोग के पूर्व संयुक्त निदेशक और प्रोटोकॉल प्रमुख मोहम्मद अमीन ने विपक्ष के सभी आरोपों को गलत बताया।
SIR Voter List Deletion: देशभर में SIR को लेकर सियासी संग्राम छिड़ा हुआ है। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अब पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा के बयान से सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। मंगलवार को SIR पर आयोजित एक नागरिक सम्मेलन पर शक के आधार पर लोगों का नाम लिस्ट से हटाने की बात कही।
पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा सने साफ-साफ कहा कि लोगों को शक के बिनाह पर वोटर लिस्ट से हटाया जा रहा है। बिना किसी सबूत के इस अंदाजे पर वोटर लिस्ट से हटाया डा रहा है कि वे नागरिक नहीं है। कॉन्फ्रेंस में बोलने वाले अन्य लोगों में रिटायर्ड IAS अधिकारी जवाहर सरकार, कोलकाता के पूर्व मेयर और पूर्व राज्यसभा सांसद विकास रंजन भट्टाचार्य और पूर्व IAS अधिकारी अनीता अग्निहोत्री शामिल थे।
EROs (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स) वोटर्स के नाम हटाने के लिए अधिकृत अधिकारी होते हैं, फिर भी उन्हें केंद्रीय रूप से नियंत्रित सिस्टम तक पहुंच नहीं दी गई। उन्होंने इस कदम को गैर-कानूनी बताया।
चुनाव आयोग की प्राथमिकता अब उन वोटर्स को हटाने पर है जिन्हें वह अयोग्य मानता है। जिस एजेंसी को वोटर्स का नाम रजिस्टर करने के लिए बनाया गया था, वही अब उन्हें हटा रही है। उन्होंने कहा, "सिर्फ EROs ही वोटर्स के नाम हटाने के लिए अधिकृत हैं, लेकिन वे ECINET का इस्तेमाल नहीं कर पाए। यह गैर-कानूनी है। आमतौर पर, कोई भी ERO के फैसले के खिलाफ जिला चुनाव अधिकारियों या मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास अपील कर सकता है।"
अशोक लावासा ने कहा कि EC की दो मुख्य जिम्मेदारियां थीं: सही वोटर लिस्ट तैयार करना और समय पर चुनाव कराना। उन्होंने कहा, "EC को पता था कि बंगाल में चुनाव कब होने हैं, फिर भी समय की कमी की जानकारी होने के बावजूद उन्होंने SIR प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।"
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त लावासा ने आगे कहा, "वोटर लिस्ट में पहले भी बदलाव हुए हैं। हालांकि, इतिहास में कभी भी वोटर्स इतने परेशान नहीं हुए कि उनके नाम लिस्ट में रहेंगे या हटा दिए जाएंगे।"
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति को लेकर विपक्ष लगातार चुनाव आयोग को निशाना बना रहा है। इस बीच, चुनाव आयोग के पूर्व संयुक्त निदेशक और प्रोटोकॉल प्रमुख मोहम्मद अमीन ने विपक्ष के सभी आरोपों को गलत साबित कर दिया है। पूर्व अधिकारी ने साफ कहा कि चुनाव आयोग के भीतर विचारों में मतभेद और असहमति कोई नई बात नहीं है।
ऐसी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। एम.एस. गिल के दौर से लेकर अशोक लवासा के समय तक, कई बार आयुक्तों के बीच वैचारिक मतभेद सामने आए हैं। हालांकि, विपक्ष और मीडिया का एक वर्ग जानबूझकर इस सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है और जनता के बीच हंगामा खड़ा कर रहा है।