

Ustad Amir Khan Birthday Special: भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में कई महान कलाकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी गायकी से महफिल में समां बांध दिया। इन्हीं में से एक बड़ा नाम उस्ताद अमीर खां साहब का है, जिन्होंने संगीत की दुनिया को एक बिल्कुल नई दिशा और नया रास्ता दिखाया। उस्ताद अमीर खां का जन्म 15 अगस्त 1912 को मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में हुआ था। उनका बचपन से ही संगीत के प्रति गहरा रुझान देखने को मिला। उन्होंने बिना किसी एक शैली की नकल किए, उस समय के दिग्गज गायकों की खूबियों को अपनाया और इंदौर घराने की नींव रखी।
उस्ताद अमीर खां साहब का मानना था कि संगीत में मौलिकता बहुत जरूरी है। उन्होंने किसी एक शैली का अनुसरण करने के बजाय समय के 3 सबसे बड़े उस्तादों की खूबियों को गहराई से समझा। उन्होंने अमान अली खां से मेरुखंड की कठिन तकनीक सीखी।
इसके बाद उन्होंने रजब अली खां की तेज़ और लयबद्ध तानों की शिक्षा ली। इसके साथ ही उन्होंने अब्दुल वहीद खां की अति-विलंबित लय में आलाप गाने की कला को आत्मसात किया। इन तीनों शैलियों के मेल से उन्होंने अपनी एक स्वतंत्र शैली तैयार की।
अलग-अलग गुरुओं के अनूठे पहलुओं को मिलाकर उन्होंने जो नई गायकी गढ़ी, वही आगे चलकर इंदौर घराने के नाम से मशहूर हुई। इस घराने को भारतीय संगीत जगत में पहला अंतर्मुखी घराना माना जाता है।
उनकी इस नई और गंभीर शैली ने हर संगीत प्रेमी का ध्यान अपनी तरफ खींचा। बंदिश को बहुत ही सुकून और गहराई के साथ पेश करना उनकी अहम खासियत बन गई। उन्होंने शास्त्रीय संगीत के नियम निभाते हुए उसमें अपनी रूह फूंक दी।
उस्ताद अमीर खां साहब सिर्फ शास्त्रीय महफिलों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने फिल्मों में भी अपनी सुरीली आवाज का जादू चलाया। बैजू बावरा, झनक झनक पायल बाजे और गूंज उठी शहनाई जैसी मशहूर फिल्मों में उनके गाए गीत आज भी याद किए जाते हैं। उस्ताद आमिर खान के तराने गाने का अंदाज इतना खास था कि लोग उन्हें तराने का तानसेन कहकर पुकारने लगे थे। संगीत के क्षेत्र में उनका यह योगदान आज भी हर नए सीखने वाले कलाकार के लिए मार्गदर्शक बना हुआ है।
बता दें कि उस्ताद अमीर खां साहब का परिवार भी कला और संगीत से बेहद करीबी से जुड़ा हुआ था। उनके पिता शाहमीर खां भिंडी बाजार घराने के एक जाने-माने सारंगी वादक थे, जो इंदौर के होलकर राजघराने में अपनी सेवाएं दिया करते थे। इतना ही नहीं, उनके दादा चंगे खां भी अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के शाही दरबार में गायक रहे थे। हालांकि, जब अमीर खां महज 9 साल के थे, तभी उनकी माता का साया उनके सिर से उठ गया था।
पिता की सलाह पर उन्होंने 1936 में रायगढ़ रियासत में महाराज चक्रधर सिंह के यहां काम करना शुरू किया। हालांकि, वहां वे ज्यादा समय तक नहीं रुके और एक साल बाद ही लौट आए। साल 1937 में उनके पिता का भी निधन हो गया, जिससे उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
इससे पहले 1934 में ही वे काम की तलाश में मुंबई आ चुके थे और मंच पर अपनी प्रस्तुतियां देने लगे थे। अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों में वे कुछ समय दिल्ली और कोलकाता में भी रहे। आखिर में देश के विभाजन के बाद उन्होंने स्थाई रूप से मुंबई को ही अपना ठिकाना बना लिया।