

Highlights
संजीव कुमार ने साधारण परिवार से निकलकर बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई।
उनकी एक्टिंग के सपने को पूरा करने में मां का अहम योगदान रहा।
'नया दिन नई रात' में उन्होंने 9 अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं।
शोले, कोशिश और आंधी जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को आज भी याद किया जाता है।
Sanjeev Kumar Death Anniversary: फिल्म इंडस्ट्री में कई ऐसे कलाकार आते हैं जो अपनी कला से बड़े पर्दे पर ऐसी अमिट लकीर खींच जाते हैं जिन्हें समय की धूल भी धुंधली नहीं कर पाती। एक्टिंग की दुनिया के ये वो स्टार्स हैं जो किरदारों में सिर्फ जान नहीं फूंकते, बल्कि उन्हें हमेशा के लिए अमर बना देते हैं।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा ही नाम संजीव कुमार का आता है, जिनकी शख्सियत और एक्टिंग आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। उनका यह सफर जितना जादुई और सम्मोहक था, उसकी शुरुआत उतनी ही काटों भरी और संघर्षों से पटी हुई थी। सफलता के इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें जिंदगी के हर मोड़ पर कड़ा इम्तिहान देना पड़ा था।
संजीव कुमार के जीवन में एक ऐसा ही दौर आया था जब एक्टिंग की दुनिया में कदम रखना उनके लिए किसी असंभव चुनौती से कम नहीं था। उस दौर में मुंबई के फफेमस डायरेक्टर शशधर मुखर्जी का 'फिल्मालय' एक्टिंग स्कूल नया मुकाम बना रहा था।
युवा संजीव कुमार की दिल की इच्छा थी कि वह उसी संस्थान से एक्टिंग की औपचारिक तालीम हासिल करें। लेकिन जब उन्होंने वहां की फीस के बारे में सुना तो उनके अरमानों पर जैसे पानी फिर गया। वह भारी मन से घर लौटे और बिना कुछ खाए खामोशी से सो गए।
मां ने जब बेटे की इस गहरी उदासी की वजह पूछी तो उन्होंने सारा सच बता दिया। एक मां ममता और अपने बच्चे के सपनों की खातिर किस हद तक जा सकती है, इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने अपने गहने तक बेच दिए। उसी बेचे हुए गहनों से उस प्रतिभाशाली युवा का दाखिला उस एक्टिंग स्कूल में मुमकिन हो पाया।
संघर्षों के उस दौर को पीछे छोड़ते हुए जब यह मंझे हुए एक्टर अपनी मंजिल की ओर बढ़े, तो उन्होंने भारतीय सिनेमा को ऐसे नायाब तोहफे दिए जिनकी मिसाल आज भी दी जाती है। वैसे तो उनके पूरे करियर में एक से बढ़कर एक बेहतरीन फिल्में शामिल हैं, लेकिन साल 1974 में रिलीज हुई फिल्म 'नया दिन नई रात' ने हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया था।
ए. भीमसिंह के डायरेक्शन में बनी यह फिल्म तमिल की सुपरहिट कृति 'नवरत्लु' की रीमेक थी। इस प्रोजेक्ट की सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इसमें किसी 1 या 2 नहीं बल्कि अकेले संजीव कुमार ने 9 अलग-अलग रोल निभाए थे। बड़े पर्दे पर अलग-अलग रूपों में ढलने की उनकी इस गजब की क्षमता ने न केवल सामान्य दर्शकों को बल्कि बड़े-बड़े निर्देशकों और समीक्षकों को भी दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया था।
अपने लगभग ढाई दशक के छोटे से मगर बेमिसाल फिल्मी सफर में उन्होंने सिर्फ 30 फिल्में ही कीं, लेकिन उनकी हर 1 फिल्म अपने आप में मील का पत्थर साबित हुई। साल 1970 में मुमताज के साथ आई उनकी फिल्म 'खिलौना' ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया था और उनकी एक्टिंग को देखकर दर्शक हक्के-बक्के रह गए थे।
इसके अलावा अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र स्टारर 'शोले' फिल्म का वह खामोश और संजीदा ठाकुर का रोल आज भी लोगों की जुबान पर ताजा है। 'आंधी', 'नमकीन', 'नौकर' और 'चरित्रहीन' जैसी फिल्मों में उन्होंने अपने संजीदा एक्टिंग से यह साबित कर दिया कि वह किसी एक ढांचे में बंधने वाले एक्टर नहीं हैं।
अपने असीम टैलेंट के बल पर उन्होंने अपने इस छोटे से करियर के दौरान बेस्ट एक्टर के नेशनल अवॉर्ड से लेकर फिल्मफेयर जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों तक अपनी मजबूत दावेदारी दर्ज कराई।
किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था और यह नायाब सितारा अपनी चमक बिखेरने के बाद बहुत कम उम्र में ही दुनिया को अलविदा कह गया। बड़े पर्दे पर किरदारों में जान फूंकने वाला यह कलाकार अपनी पर्सनल लाइफ के तमाम पन्नों को पीछे छोड़ते हुए अचानक इस दुनिया से रुखसत हो गया।
लेकिन जब कभी भी फिल्म इंडस्ट्री के स्वर्णिम इतिहास और सच्चे एक्टर्स की बात होगी, तो उस फेहरिस्त में इस दिग्गज का नाम सबसे ऊपर चमकता हुआ दिखाई देगा।
संजीव कुमार के द्वारा निभाए गए वो यादगार रोल और उनकी जिंदगी का यह कड़ा संघर्ष आने वाली हर पीढ़ी के कलाकारों को प्रेरित करता रहेगा।