11 साल की उम्र में छोड़ा घर, सुरों ने बनाया भारत रत्न, जानें पंडित भीमसेन जोशी की कहानी

Bhimsen Joshi Classical Singer: 11 साल की उम्र में घर छोड़कर गुरु की तलाश में निकले पंडित भीमसेन जोशी ने कठिन साधना और सुरों की ताकत से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
Pandit Bhimsen Joshi Birth Anniversary Indian Classical Music Legend Bharat Ratna
भीमसेन जोशी (फोटो-सोशल मीडिया)
Published on: 
Updated on: 

Pandit Bhimsen Joshi Birth Anniversary: कभी-कभी इतिहास की सबसे महान कहानियां बेहद साधारण जगहों से जन्म लेती हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के महान स्तंभ पंडित भीमसेन जोशी की जीवन यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही, जिसकी शुरुआत एक मामूली ग्रामोफोन की दुकान से हुई और अंत भारत रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान तक पहुंची। सुरों के इस साधक ने अपनी आवाज़ से न सिर्फ संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि पीढ़ियों को प्रेरित भी किया।

पंडित भीमसेन जोशी का जन्म 4 फरवरी 1922 को कर्नाटक के गड़ग जिले में हुआ था। उनके पिता गुरुराज जोशी संस्कृत और कन्नड़ भाषा के विद्वान थे। परिवार का संगीत से कोई खास नाता नहीं था, लेकिन भीमसेन का मन बचपन से ही सुरों में बस गया था। स्कूल से लौटते वक्त वे अक्सर ग्रामोफोन और रेडियो की दुकानों के सामने रुक जाते और घंटों रिकॉर्ड पर बजते शास्त्रीय रागों को सुनते रहते। वही दुकान उनके जीवन की पहली संगीत पाठशाला बनी।

पंडित भीमसेन जोशी का संघर्ष

संगीत के प्रति उनकी दीवानगी इतनी गहरी थी कि मात्र 11 साल की उम्र में वे घर छोड़कर गुरु की तलाश में निकल पड़े। बिना किसी ठिकाने और सहारे के उन्होंने कई शहरों की खाक छानी, मंदिरों और गलियों में गाया। इसी संघर्ष के दौरान उनकी मुलाकात महान गुरु पंडित सवाई गंधर्व से हुई। गुरु ने शर्त रखी कि सीखने के लिए पहले सब कुछ भूलना होगा। भीमसेन जोशी ने यह चुनौती स्वीकार की और वर्षों की कठिन साधना से अपनी गायकी को निखारा।

19 वर्ष की उम्र में दी पहली बार प्रस्तुति

1941 में महज 19 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार मंच पर प्रस्तुति दी। उनकी आवाज़ में ताकत, गहराई और भावनाओं का ऐसा संगम था जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। बाद में वे मुंबई पहुंचे और ऑल इंडिया रेडियो से जुड़े, जिससे उनकी आवाज़ देशभर में पहचान बनाने लगी। ख्याल गायकी में उन्होंने दरबारी, मालकौंस, तोड़ी, यमन, भीमपलासी और ललित जैसे रागों को अमर बना दिया।

भजन और विट्ठल भक्ति गीतों से लोगों के दिलों में बनाई जगह

शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ उन्होंने भजन और विट्ठल भक्ति गीतों से भी आम लोगों के दिलों में जगह बनाई। उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण और वर्ष 2008 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 24 जनवरी 2011 को उनका निधन हुआ, लेकिन सुरों की दुनिया में उनकी गूंज आज भी जीवित है। पंडित भीमसेन जोशी का जीवन यह सिखाता है कि सच्ची लगन और साधना किसी भी साधारण शुरुआत को असाधारण बना सकती है।

Navbharat Live: Hindi News
navbharatlive.com