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गुरु दत्त की पहली पसंद अभिनय नहीं, बल्कि निर्देशन था।
'प्यासा' में दिलीप कुमार के इनकार के बाद गुरु दत्त ने विजय का किरदार निभाया।
10 अक्टूबर 1964 को 39 साल की उम्र में गुरु दत्त का निधन हो गया।
Guru Dutt Death Anniversary: भारतीय सिनेमा के दिग्गज निर्देशक और अभिनेता गुरु दत्त ने अपनी फिल्मों के जरिए हिंदी सिनेमा को एक नई पहचान दी। उनकी फिल्मों में कहानी कहने का अंदाज, कैमरे का इस्तेमाल और किरदारों की भावनाएं आज भी फिल्मकारों को प्रेरित करती हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरु दत्त की पहली पसंद निर्देशन था, अभिनय नहीं।
गुरु दत्त की दो यादगार फिल्मों 'प्यासा' और 'साहेब बीबी और गुलाम' में उनका अभिनय कुछ ऐसे हालात में सामने आया, जब दूसरे कलाकार इन भूमिकाओं को नहीं निभा सके। साल 1957 में रिलीज हुई फिल्म 'प्यासा' गुरु दत्त के करियर की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल है। इस फिल्म में उन्होंने विजय नाम के एक संघर्षरत कवि का किरदार निभाया था।
प्यासा में एक ऐसे कलाकार की कहानी दिखाई गई, जिसकी प्रतिभा को समाज आसानी से स्वीकार नहीं करता। बताया जाता है कि गुरु दत्त इस फिल्म में खुद अभिनय नहीं करना चाहते थे। उन्होंने विजय की भूमिका के लिए दिलीप कुमार के नाम पर विचार किया था, लेकिन उस समय दिलीप कुमार फिल्म 'देवदास' में व्यस्त थे। उनके इस भूमिका को स्वीकार नहीं करने के बाद गुरु दत्त ने खुद कैमरे के सामने आने का फैसला किया। गुरु दत्त ने विजय के किरदार में अकेलेपन, संघर्ष और इमोशनल पीड़ा को जिस तरह पर्दे पर उतारा, उसने दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी।
गुरु दत्त की फिल्म 'साहेब बीबी और गुलाम' साल 1962 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म में उन्होंने भूतनाथ का किरदार निभाया था। फिल्म में मीना कुमारी और वहीदा रहमान भी अहम भूमिकाओं में नजर आई थीं। इस फिल्म में भी गुरु दत्त के अभिनय को काफी सराहना मिली। निर्देशन के साथ अभिनय में उनकी पकड़ ने फिल्म को खास बनाया। फिल्म की कहानी, कलाकारों के प्रदर्शन और संगीत ने इसे हिंदी सिनेमा की यादगार फिल्मों में शामिल कर दिया।
गुरु दत्त का असली नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण था। उनका जन्म 9 जुलाई 1925 को हुआ था। उन्होंने 'प्यासा', 'कागज के फूल' और 'साहेब बीबी और गुलाम' जैसी फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई। 10 अक्टूबर 1964 को महज 39 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। हालांकि, उनके निर्देशन और अभिनय की विरासत आज भी भारतीय सिनेमा में जिंदा है।