अयोध्या में 'राम नाम का जाप' भी नहीं आया काम, मोदी लहर के बावजूद हारे लल्लू सिंह, जानें ये पांच कारण

बीजेपी अयोध्या सीट को लोकसभा चुनाव 2024 की सबसे सेफ सीट मान रही थी। राम मंदिर प्रतिष्ठा और पीएम मोदी को अयोध्या में मिले रेस्पांस के बाद भी दो बार फैजाबाद सीट से सांसद रह चुके लल्लू सिंह चुनाव हार गए।
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अयोध्या में हारे लल्लू सिंह
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लखनऊ: लोकसभा चुनाव 2024 के रिजल्ट ने बीजेपी को बड़ा झटका दिया है। पीएम मोदी को उत्तर प्रदेश में करारी हार का सामना करना पड़ा है। प्रदेश की सबसे हॉट सीट बनी अयोध्या लोकसभा सीट पर लल्लू सिंह को करारी हार मिली है। अयोध्या में राममंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम के जरिए बीजेपी ने वोट बटोरने की कोशिश की, लेकिन पार्टी के प्रत्याशी लल्लू सिंह जीत का खिताब नहीं ले पाए। लल्लू सिहं के अयोध्या सीट हारने के कुछ कारण की बात करते हैं।

बीजेपी अयोध्या सीट को लोकसभा चुनाव 2024 की सबसे सेफ सीट मान रही थी। राम मंदिर प्रतिष्ठा और पीएम मोदी को अयोध्या में मिले रेस्पांस के आधार पर बीजेपी की जीत तय मानी जा रही थी। इसके बाद भी दो बार फैजाबाद सीट से सांसद रह चुके लल्लू सिंह चुनाव हार गए। फैजाबाद सीट को अयोध्या सीट के नाम से जाना जाता है। फैजाबाद सीट पर सपा के अवधेश प्रसाद ने बीजेपी प्रत्याशी लल्लू सिंह को 48104 वोट से हरा दिया।

बीजेपी के राम मंदिर प्रतिष्ठा के बाद भी लोकसभा सीट पर बीजेपी प्रत्याशी लल्लू सिंह क्यों हार गए? इसके कारणों की चर्चा करते हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि इसका पहला कारण अयोध्या में संविधान बदलने के लिए 400 पार के नारे लगाना रहा।

पहला कारण

इस सीट पर तीसरी बार बीजेपी ने लल्लू सिहं को मौका दिया, वो दो बार फैजाबाद सीट से सांसद रह चुके हैं। लल्लू सिंह ने ‘संविधान बदलने के लिए 400 पार चाहिए’ का नारा लगाया था। दरअसल पीएम मोदी ने बीजेपी को 370 पार और एनडीए को 400 पार का नारा दिया था। इसके उलट संविधान बदलने के लिए 400 पार चाहिए की बात कहने वाले नेताओं में सबसे पहले लल्लू सिंह शामिल थे।

दूसरा कारण

अयोध्या सीट पर बसपा-कांग्रेस के प्रत्याशियों की अच्छी पकड़ रही है। साल 2004 से 2009 में फैजाबाद की सीट पर बहुजन समाज पार्टी के मित्रसेन यादव सांसद रहे। वहीं लल्लू सिहं से पहले 2009 से 2014 तक यहां कांग्रेस का दबदबा था। कांग्रेस के निर्मल खत्री यहां सांसद थे। वोटों के जोड़-तोड़ का फायदा सपा के पासी बिरादरी से आने वाले अवधेश प्रसाद को मिला।

तीसरा कारण- सत्ताविरोधी लहर

दस साल से सासंद रहने की वजह से लल्लू सिंह के खिलाफ सत्ताविरोधी लहर उठने लगी थी। अयोध्या में रामपथ के निर्माण के लिए जमीन का अधिग्रहण किया गया। कई लोगों के घर-दुकान तोड़े गए। निराशाजनक पहलू यह रहा कि कई लोगों को मुआवजा नहीं मिला। इसे लेकर जनता की नाराजगी साफ दिखी है।

चौथा कारण- क्षेत्र में एक्टिव रहने से ज्यादा योगी-मोदी पर भरोसा किया

लोगों की नाराजगी उनके क्षेत्र में मौजूदगी को लेकर थी। अयोध्या में बीजेपी ने माना कि उम्मीदवार के चेहरे की जगह अयोध्या में पीएम मोदी का चेहरा चलेगा। लल्लू सिंह ने अपनी तरफ से मेहनत करने की बजाय अयोध्या चुनाव प्रचार में मोदी-योगी पर भरोसा किया। ये विफल रहा।

पांचवा कारण- राम लला के भरोसे चुनाव जीतने का मन बनाया

बीजेपी ने अयोध्या धाम के विकास पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया। चुनाव-प्रचार में अयोध्या धाम में हुए विकास कार्यों को बताया गया, लेकिन सासंद ने अयोध्या के ग्रामीण क्षेत्रों पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

सपा ने सारी खामियों को प्रचार के दौरान भुनाया

वहीं सपा ने लल्लू सिंह और बीजेपी की खामियों को प्रचार के दौरान खूब भुनाया। आवारा पशुओं के मुद्दे को समाजवादी पार्टी ने मुद्दा बनाया था। बीजेपी को इस मुद्दे पर नाराजगी झेलनी पड़ी और हार का दंश झेलना पड़ा।

वहीं संख्या के लिहाज से अयोध्या की सबसे बड़ी जाती पासी मानी जाती है। इस बात का ख्याल करते हुए अखिलेश यादव ने एक बड़ा दांव खेला। अखिलेश ने सामान्य सीट होने के बावजूद अयोध्या में पासी बिरादरी से अपने सबसे मजबूत पासी चेहरे को उम्मीदवार बनाया। अवधेश पासी छह बार के विधायक मंत्री और समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से रहे हैं।

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