चुनाव 2026: 'वोट नहीं दिया तो बेगाने हो जाएंगे?' पहचान बचाने को ट्रेनों में ठूसकर घर जाने को मजबूर लाखों मजदूर

Assembly Elections 2026: विधानसभा चुनाव से पहले लाखों प्रवासी मजदूर नाम कटने और नागरिकता खोने के डर से घर लौट रहे हैं। ट्रेनों में भारी भीड़ और संसाधनों की कमी ने इस मानवीय संकट को और गहरा दिया है।
railway croud for election 2026
प्रतीकात्मक फोटो, सोर्स- सोशल मीडिया
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SIR Voter List fear of Migrant Workers: देश के अलग-अलग कोनों से चलने वाली ट्रेनों के जनरल डिब्बों में आज जो तिल रखने की जगह नहीं है, वह केवल यात्रियों की सामान्य भीड़ नहीं है। यह उन लाखों प्रवासी मजदूरों की बेबसी की कहानी है, जो अपनी जड़ों को बचाने के लिए हजारों मील का सफर तय कर रहे हैं।

पश्चिम बंगाल समेत 5 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की तारीखें जैसे-जैसे नजदीक आ रही हैं, वैसे-वैसे मुंबई, बेंगलुरु, दिल्ली, अहमदाबाद और यूपी के कई शहरों से दिहाड़ी मजदूरों और कामगारों का पलायन तेज हो गया है। इनमें महज एक वोट डालने की इच्छा नहीं है, बल्कि अपनी पहचान और नागरिकता को सुरक्षित रखने की एक छटपटाहट है।

वोटर लिस्ट से नाम कटने के डर ने छीन ली नींद

प्रवासी मजदूरों के इस अचानक घर लौटने के पीछे 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' नाम की एक प्रक्रिया का गहरा साया है। मजदूरों के बीच यह बात जंगल की आग की तरह फैल गई है कि अगर उन्होंने इस बार चुनाव में मतदान नहीं किया, तो उनका नाम हमेशा के लिए मतदाता सूची से हटा दिया जाएगा। लोगों का दावा है कि पिछले साल कई ऐसे मामले सामने आए थे जहां लोगों के नाम लिस्ट से काट दिए गए और कुछ को अवैध प्रवासी करार दे दिया गया। पुणे में काम करने वाले कई लोग बताते हैं कि एनआरसी की प्रक्रिया के दौरान उनका नाम हटने से उनके परिवार को कितनी मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी। यही वजह है कि आज एक आम मजदूर के लिए वोट देना केवल एक लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, बल्कि भविष्य में नागरिकता से जुड़े किसी भी कानूनी विवाद से बचने का कवच बन गया है।

महंगे टिकट और जनरल डिब्बों की वो जद्दोजहद बनी मजबूरी

इन मजदूरों के लिए घर तक का रास्ता कांटों भरा साबित हो रहा है। ट्रेनों की संख्या सीमित है, लेकिन ये भीड़ बेताहाशा बढ़ती ही जा रही है। जिससे टिकटों की कीमतें आसमान छू रही हैं। हालत यह है कि एक महीने पहले टिकट बुक करने की कोशिश करने वालों को भी 150 से ऊपर की वेटिंग मिल रही है। मजबूरन, कई लोग अपनी मेहनत की कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च कर जनरल डिब्बों में भरकर सफर कर रहे हैं।

मजदूरों का सवाल है कि जब सरकार महामारी के समय विशेष ट्रेनें चला सकती थी, तो लोकतंत्र के इस सबसे बड़े पर्व के लिए अतिरिक्त व्यवस्था क्यों नहीं की गई। बेंगलुरु में काम करने वाली सीमा जैसी महिलाओं के लिए 5,000 रुपये का टिकट खरीदना उनकी महीने भर की बचत गंवाने जैसा है, लेकिन पहचान खोने का डर उन्हें यह आर्थिक चोट सहने पर भी मजबूर कर रहा है।

उद्योगों पर मंडराया संकट का काला साया

इस सामूहिक पलायन का असर केवल बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान और पंजाब जैसे राज्यों की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। राजस्थान के औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले करीब ढाई लाख बंगाली मजदूर घर लौट चुके हैं। अब इन कारखानों में काम ठप होने की नौबत आ गई है। जयपुर के सर्राफा बाजार में जेवरात बनाने वाले तकरीबन एक लाख कारीगरों के चले जाने से बड़ा संकट खड़ा हो गया है। वहीं पंजाब के खेतों में फसल कटाई के समय मजदूरों की कमी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। पश्चिम बंगाल सरकार ने 'श्रमश्री' जैसी योजनाओं के जरिए लौटने वाले परिवारों को आर्थिक मदद का वादा तो किया है, लेकिन 24 लाख प्रवासी मजदूरों के लिए मौजूदा परिवहन और प्रशासनिक व्यवस्थाएं नाकाफी साबित हो रही हैं।

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