

Sugar Price Hike: उत्पादन में कमी की आशंका, सरप्लस स्टॉक में कमी और इथेनॉल बनाने में बढ़ते उपयोग के कारण चीनी की कीमतों में रिकॉर्डतोड़ तेजी आने लगी हैं। पिछले डेढ़ महीने में चीनी 30% से अधिक महंगी होकर नई ऊंचाई पर पहुंच गई है। जहां महाराष्ट्र में एम ग्रेड चीनी की थोक कीमतें 5300-5400 रुपए प्रति क्विंटल (जीएसटी सहित) पर पहुंच गयी हैं, जो जुलाई में 4000-4100 रुपए पर थीं।
वहीं, उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत की अन्य मंडियों में तो कीमतें 5900-6000 रुपए प्रति क्विंटल तक जा पहुंची हैं। थोक कीमतें बढ़ने से खुदरा बाजारों में चीनी 60 रुपये प्रति किलो पर बिकने लगी है। त्योहारी सीजन से पहले आई भारी तेजी ने सरकार और उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।
हालांकि, केंद्र सरकार चीनी कीमतों को काबू में रखने के लिए स्टॉक लिमिट, नया सत्र जल्द शुरू करने, आयात पर विचार सहित कई उपाय कर तो रही है, लेकिन ये उपाय बेअसर साबित हो रहे है। व्यापारी आशंका जता रहे हैं कि त्योहारों में चीनी 70 रुपये तक पहुंच सकती है। चीनी महंगी होने से इस साल गणपति-दशहरा और दिवाली पर मिठाइयां भी महंगी हो जाएंगी।
उद्योग का एक वर्ग पहले का बचा स्टॉक को 40-42 लाख टन मानता है, जबकि शोधकर्ता इसे कम, यानी 32-35 लाख टन बताते हैं, जो नए सत्र की शुरुआत में आपूर्ति की तंगी की स्थिति की ओर इशारा करता है। इसकी तुलना में, मौजूदा 2025-26 सत्र की शुरुआत एक अक्टूबर, 2025 को 47 लाख टन के शुरुआती स्टॉक के साथ हुई थी।
शुरुआती स्टॉक, इस साल 280 लाख टन के अनुमानित उत्पादन और 7 लाख टन के निर्यात को ध्यान में रखते हुए, 2025-26 के लिए कुल उपलब्धता 320 लाख टन बैठती है, जबकि घरेलू जरूरत 285 लाख टन की होती है। इससे 35 लाख टन का पहले का स्टॉक बचता है, जो 50 लाख टन की जरूरत से भी कम है और इससे मिल कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है।
कीमतें बढ़ने का एक बड़ा कारण यह भी है कि सरप्लस स्टॉक अनुमान से कम बताया जा रहा है और इस साल मानसून कमजोर रहने से उत्पादन कम हो सकता है। 5 साल पहले देश का सरप्लस स्टॉक 85 लाख टन रहता था, जो अब 40 लाख टन से भी कम रहने की आशंका है। नए 2026-27 सत्र (अक्टूबर-सितंबर) के लिए शुरुआती स्टॉक के 50 लाख टन की घरेलू जरूरत से कम रहने की संभावना है। हालांकि, सरकार ने अभी तक इस आंकड़े को अंतिम रूप नहीं दिया है।
व्यापार महासंघ 'कैट' के राष्ट्रीय मंत्री शंकर ठक्कर का कहना है कि हमने तीन साल पहले ही सरकार को सलाह दी थी कि खाद्य कृषि उत्पादों का इथेनॉल में उपयोग अधिक नहीं किया जाए क्योंकि भारत विशाल आबादी वाला देश है और यहां कभी भी कमजोर मानसून कृषि पैदावार घटा सकता है। इस साल यही डर है।
सरकार ने पेट्रोलियम आयात में कमी लाने और किसानों व चीनी मिल कामगारों के हित में इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा तो दिया, लेकिन अब पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण पर सरकार को आलोचना झेलनी पड़ रही है और चीनी महंगी होने से आम जनता पर महंगाई का बोझ भी बढ़ेगा। इसलिए गन्ना, मक्का और चावल का इथेनॉल में उपयोग सीमित रखना होगा।