Gold Loan : अब गोल्ड लोन लेना नहीं होगा आसान, आरबीआई लेगा बहुत बड़ा फैसला

गोल्ड लोन लेना पहले से थोड़ा कठिन और समय लेने वाला हो सकता है। लोन अमाउंट कम मिल सकता है, क्योंकि वैल्यूएशन प्रोसेस सख्त हो सकती है। ब्याज दरें बढ़ सकती हैं, क्योंकि एनबीएफसी और बैंकों पर नियमों का प्रेशर बढ़ेगा।
सोना हुआ सस्ता, चांदी का भी गिरा भाव
प्रतीकात्मक तस्वीर
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नई दिल्ली : व्यक्ति जब भी मुश्किल समय में होता है, तो वो अपने सोने को गिरवी रखकर अपनी मदद करता है। ऐसे में अगर आप गोल्ड लोन लेने के बारे में सोच रहे हैं, तो ये खबर आपके लिए खास साबित हो सकती है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई जल्द ही गोल्ड लोन की प्रोसेस को कठिन करने के लिए नई गाइडलाइन जारी कर सकती है। आरबीआई के इस कदम से बैंकों और नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों के लिए लागू होगा, ताकि गोल्ड लोन में ट्रांसपरेंसी और सिक्योरिटी बढ़ायी जा सके।

भारत में गोल्ड लोन सबसे फेमस और आसान लोन ऑप्शनस में से एक हैं। लोग जरूरत के समय पर गहने को गिरवी रखकर पैसों का इंतजाम कर सकते हैं। लेकिन हाल ही के सालों में कई धोखाधड़ी और हेरफेर के मामले सामने आए हैं। जिनमें लोन देने वाली कंपनियों ने लोन टू वैल्यू यानी एलटीवी अनुपात का उल्लंघन किया है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आरबीआई इस बात को सुनिश्चित करना चाहता है कि लोन देने वाली कंपनियां नियमों का सही से पालन करें और कस्टमर्स को बिना किसी रिस्क के बचाया जाए।

किन नियमों को किया जाएगा सख्त?

लोन टू वैल्यू अनुपात : हाल के समय में, बैंकों को सोने की कीमत का ज्यादातर 75 प्रतिशत तक लोन देने की परमिशन है। ये हो सकता है कि इस लिमिट को बढ़ाकर और भी सख्त किया जाना चाहिए।

गोल्ड की क्वालिटी की जांच : बैंकों और एनबीएफसी को अब ज्यादा सख्ती से सोने की प्यूरिटी और वजन की जांच करनी होगी, जिससे नकली या मिलावट वाले सोने के बदले में लोन ना मिले।

लोन रिपेमेंट के नियम : कुछ एनबीएफसी गोल्ड लोन को इनसिक्योर तरीके से बांट रही थीं, जिससे डिफॉल्ट का खतरा बढ़ गया है। आरबीआई इसे रोकने के लिए लोन रिपेमेंट प्रोसेस को मजबूत कर सकता है।

वैल्यूएशन प्रोसेस में बदलाव : अब सोने की वैल्यू तय करने के लिए स्टैंडर्ड और ट्रांसपरेंट प्रोसेस अपनाने के लिए कहा जा सकता है, जिससे मनमानी वैल्यूएशन को रोका जा सकता है।

ग्राहकों पर होगा ये असर?

गोल्ड लोन लेना पहले से थोड़ा कठिन और समय लेने वाला हो सकता है। लोन अमाउंट कम मिल सकता है, क्योंकि वैल्यूएशन प्रोसेस सख्त हो सकती है। ब्याज दरें बढ़ सकती हैं, क्योंकि एनबीएफसी और बैंकों पर नियमों का प्रेशर बढ़ेगा।

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