अगर लंबे समय तक चला ईरान युद्ध, तो भारत के सामने ये 5 बड़े खतरे; RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने दी चेतावनी

RBI Governer Sanjay Malhotra: आरबीआई को अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी 6.8%, दूसरी तिमाही में 6.7%, तीसरी तिमाही में 7% और चौथी तिमाही में 7.2% की दर से बढ़ेगी।
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आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा, (सोर्स- सोशल मीडिया)
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RBI Governer On Middle East Crisis: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करते हुए स्थिर रखा है। इसके साथ ही जीडीपी ग्रोथ और महंगाई के जोखिमों पर भी चिंता जताई। अमेरिका-ईरान युद्ध और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव को भी भारत की विकास संभावनाओं के लिए एक जोखिम के रूप में बताया गया है।

आरबीआई गवर्नर ने कहा कि संघर्ष शुरू होने से पहले, भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति मजबूत थी, जिसमें विकास की गति तेज थी और महंगाई कम थी। मार्च में संघर्ष तीव्र होने के साथ ही परिस्थितियां विपरित हो गईं।

मिडिल ईस्ट युद्ध पर RBI गवर्नर का बयान

संजय मल्होत्रा ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादें मौजूदा समय में पिछले संकटों की तुलना में और कई अन्य अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले कहीं अधिक मजबूत हैं। केंद्रीय बैंक के गवर्नर का मानना ​​है कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को झटकों का सामना करने के लिए अधिक लचीलापन मिलेगा। हालांकि, विकास संबंधी अनुमानों के लिए नकारात्मक जोखिम बने हुए हैं। खासकर पश्चिम एशिया में लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष की स्थिति में कोई सुधार नहीं होना समस्या को और बढ़ा सकता है।

युद्ध का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कितना असर

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने उन पांच तरीकों की ओर इशारा किया जिनसे मौजूदा संघर्ष से भारतीय अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। उन्होंने उन माध्यमों का विस्तार से बताया जिनके जरिए यह झटका महसूस किया जा सकता है।

  • कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आयातित महंगाई को बढ़ा सकती हैं और चालू खाता घाटे को और चौड़ा कर सकती हैं।
  • ऊर्जा बाजारों, उर्वरकों और अन्य वस्तुओं में व्यवधान से उद्योग, कृषि और सेवाओं पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है, जिससे घरेलू उत्पादन में कमी आ सकती है।
  • बढ़ती अनिश्चितता, जोखिम से बचने की प्रवृत्ति में वृद्धि और सुरक्षित निवेश की मांग घरेलू तरलता की स्थिति, आर्थिक गतिविधि, उपभोग और निवेश को प्रभावित कर सकती है।
  • वैश्विक विकास की कमजोर संभावनाएं बाहरी मांग को कम कर सकती हैं और प्रेषण प्रवाह को घटा सकती हैं।
  • वैश्विक वित्तीय बाजारों से उत्पन्न होने वाले विपरित प्रभावों से घरेलू वित्तीय स्थितियां और भी कठिन हो सकती हैं और उधार लेने की लागत बढ़ सकती है।

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा की चेतावनी

आरबीआई गवर्नर ने चेतावनी दी है कि आपूर्ति में आई रुकावट, जो अभी शुरू में एक आपूर्ति संकट के रूप में दिख रही है, मध्यम अवधि में मांग संकट में बदल सकती है यदि सप्लाई चेन की बहाली में देरी होती है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए जीडीपी वृद्धि दर 7.6% रहने का अनुमान है, जबकि आरबीआई के वित्त वर्ष 2027 की पहली मौद्रिक नीति समीक्षा में किए गए प्रारंभिक आकलन के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 6.9% रहने की संभावना है।

अर्थव्यवस्था को लेकर RBI का पूर्वानुमान

आरबीआई ने पूर्वानुमान लगाया है कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी 6.8%, दूसरी तिमाही में 6.7%, तीसरी तिमाही में 7% और चौथी तिमाही में 7.2% की दर से बढ़ेगी। संजय मल्होत्रा ने अपने बयान में कहा कि आगे चलकर, ऊर्जा और अन्य वस्तुओं की ऊंची कीमतों के साथ-साथ स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रूकावट के कारण इनपुट की उपलब्धता में आने वाली बाधाओं से 2026-27 में विकास प्रभावित होने की संभावना है।

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