अंकिता पटेल
क्या किसी अपराध की सजा के तौर पर किसी इंसान की जान लेना उचित है? इसी सवाल पर दुनिया भर में बहस होती रही है। विश्व मृत्युदंड विरोधी दिवस न्याय से जुड़े मुद्दों पर सोचने का अवसर देता है।
हर साल 10 अक्टूबर को विश्व मृत्युदंड विरोधी दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 2003 में हुई थी। इसका उद्देश्य मृत्युदंड के इस्तेमाल और उससे जुड़े कानून के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
जब किसी व्यक्ति को गंभीर अपराध में दोषी ठहराए जाने के बाद अदालत कानून के तहत मौत की सजा सुनाती है, तो उसे मृत्युदंड कहा जाता है। अलग-अलग देशों में इसे लेकर कानून और न्यायिक प्रक्रियाएं अलग हैं।
विश्व मृत्युदंड विरोधी दिवस की पहल मृत्युदंड को समाप्त करने के लिए काम करने वाले संगठनों ने की थी। यह दिन सरकारों, कानूनी विशेषज्ञों और आम लोगों के बीच इस विषय पर संवाद को बढ़ावा देता है।
वर्ष 2026 और 2027 के अभियान की थीम है “Stories for Life”। इसका उद्देश्य मृत्युदंड से प्रभावित लोगों की वास्तविक कहानियों, अनुभवों और मानवीय पक्ष को सामने लाना है।
न्याय व्यवस्था का उद्देश्य निष्पक्ष सुनवाई और साक्ष्यों के आधार पर फैसला देना है। लेकिन गलत साक्ष्य, जांच की कमियां या न्यायिक चूक के कारण गलत सजा का जोखिम बना रह सकता है।
मृत्युदंड के विरोध में काम करने वाले संगठन जीवन के अधिकार, मानवीय गरिमा और न्यायिक गलती की आशंका को प्रमुख मुद्दा मानते हैं। वहीं, इसके समर्थक कुछ गंभीर अपराधों में इसे उचित सजा मानते हैं।
कई देशों ने मृत्युदंड को कानून से हटा दिया है या लंबे समय से इसका इस्तेमाल नहीं किया है। हालांकि, कुछ देशों में यह अब भी कानूनी सजा है और वहां लोगों को मृत्युदंड दिया जाता है।
इसका असर केवल सजा पाए व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। उसके परिवार, पीड़ितों के परिजन और संबंधित समुदाय भी भावनात्मक व सामाजिक चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।
विश्व मृत्युदंड विरोधी दिवस न्याय, मानवाधिकार और मानवीय गरिमा पर खुलकर चर्चा करने का अवसर है।