अंकिता पटेल
छींक आना शरीर की एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया है। जब नाक में धूल, परागकण या कोई उत्तेजक चीज पहुंचती है, तो शरीर उसे बाहर निकालने की कोशिश करता है।
नाक के अंदर मौजूद संवेदनशील नसें धूल या दूसरे irritants को महसूस करती हैं। ये संकेत दिमाग तक पहुंचते हैं और छींक की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
छींक शरीर का एक तरह का नेचुरल क्लीनिंग सिस्टम है। इसके जरिए नाक और सांस की नली में मौजूद परेशान करने वाले कण बाहर निकल सकते हैं।
दिमाग के संकेत के बाद सांस लेने वाली मांसपेशियां तेजी से सक्रिय होती हैं। फेफड़ों से हवा जोर से बाहर निकलती है और इसी प्रक्रिया को हम छींक के रूप में महसूस करते हैं।
कुछ लोगों में तेज परफ्यूम, धुआं या अन्य तेज गंध नाक को irritate कर सकती है। ऐसे में बिना एलर्जी के भी छींक आ सकती है।
एलर्जी होने पर शरीर कुछ पदार्थों को हानिकारक मानकर प्रतिक्रिया करता है। धूल, परागकण या पालतू जानवरों से जुड़े एलर्जेंस कुछ लोगों में बार-बार छींक का कारण बन सकते हैं।
कुछ लोगों को अचानक तेज रोशनी देखने पर छींक आ सकती है। इसे Photic Sneeze Reflex कहा जाता है। यह एक आनुवंशिक प्रवृत्ति से जुड़ा माना जाता है।
कभी-कभी पहली छींक के बाद भी नाक में मौजूद irritant पूरी तरह बाहर नहीं निकलता। ऐसे में शरीर लगातार एक से ज्यादा बार छींक सकता है।
छींक को जबरदस्ती रोकना सही नहीं माना जाता। छींक आने पर मुंह और नाक को टिश्यू या कोहनी से ढकना और हाथों को साफ रखना संक्रमण के फैलने को कम करने में मदद करता है।
छींक शरीर की दुश्मन नहीं, बल्कि बचाव की एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया है। नाक में पहुंची हानिकारक कणों को बाहर निकालने में यह शरीर की मदद करती है।