सिमरन सिंह
एलन मस्क की Starlink सैटेलाइट के जरिए इंटरनेट देती है। भारत में इसकी एंट्री से दूरदराज के इलाकों में कनेक्टिविटी बेहतर हो सकती है, लेकिन सुरक्षा से जुड़े सवाल भी अहम हैं।
14 अक्टूबर 2026 तक Starlink की कमर्शियल सर्विस भारत में शुरू नहीं हुई है। इसके लिए जरूरी सरकारी मंजूरियों, स्पेक्ट्रम और सुरक्षा शर्तों को पूरा करना होगा।
भारत में Starlink की आधिकारिक कीमत घोषित नहीं हुई है। वेबसाइट पर पहले दिखे ₹8,600 मासिक प्लान और ₹34,000 के हार्डवेयर की कीमतों को कंपनी ने टेस्ट डेटा बताया था।
मोबाइल इंटरनेट सेल टावर से मिलता है, जबकि Starlink डिश या टर्मिनल सैटेलाइट से कनेक्ट होता है। इससे उन इलाकों में इंटरनेट पहुंच सकता है जहां टावर या फाइबर नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल है।
Starlink में मोबाइल टावर आधारित लोकेशन ट्रैकिंग उसी तरह काम नहीं करेगी। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि यूजर को ट्रैक करना असंभव होगा। जांच के लिए दूसरे तकनीकी तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
दिसंबर 2024 में मणिपुर में हथियारों के साथ Starlink उपकरण मिलने की खबर आई थी। अंडमान सागर में ड्रग तस्करी के मामले में भी ऐसा डिवाइस मिलने की रिपोर्ट आई। हालांकि, इससे भारत में अधिकृत सर्विस सक्रिय होने की पुष्टि नहीं होती।
सैटेलाइट इंटरनेट की निगरानी और इसे बंद करने की प्रक्रिया पारंपरिक नेटवर्क से अलग हो सकती है। लेकिन इससे भारत का सुरक्षा सिस्टम टूट जाएगा, ऐसा कहना सही नहीं है। सरकारी नियमों का पालन जरूरी होगा।
Starlink शुरू होने पर दूरदराज के गांवों, पहाड़ी और सीमावर्ती इलाकों में इंटरनेट का विकल्प मिल सकता है। इससे ऑनलाइन पढ़ाई, वीडियो कॉल और कारोबार में मदद हो सकती है।
बाढ़, भूकंप या चक्रवात के दौरान सैटेलाइट इंटरनेट वैकल्पिक कनेक्टिविटी दे सकता है। हालांकि, इसकी उपलब्धता बिजली, उपकरण, मौसम और नेटवर्क की स्थिति पर निर्भर करेगी।
Starlink की सफलता उसकी कीमत और सुरक्षा नियमों के पालन पर निर्भर करेगी। यह हर जगह मोबाइल नेटवर्क या फाइबर की जगह नहीं लेगा, लेकिन कमजोर कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकता है।