रीता राय सागर
गजकेसरी योग को ज्योतिष में शुभ योग माना जाता है, लेकिन हर कुंडली में इसका प्रभाव समान नहीं होता है।
जब गुरु, चंद्रमा से केंद्र भाव यानी 1, 4, 7 या 10वें भाव में स्थित होता है, तो गजकेसरी योग बनता है। यह ज्ञान, प्रतिष्ठा, समझदारी और सकारात्मक अवसर के लिए अनुकूल होता है।
ज्योतिषीय के अनुसार योग का प्रभाव ग्रहों की स्थिति, शक्ति, राशि और दूसरे ग्रहों के प्रभाव पर निर्भर करता है। इसलिए सिर्फ योग बनना ही पर्याप्त नहीं होता।
अगर गुरु कमजोर स्थिति में हो या उस पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो, तो इस योग से मिलने वाले शुभ परिणाम भी कम हो जाते हैं।
गजकेसरी योग में अगर चंद्रमा कमजोर हो, पीड़ित हो या उस पर दूसरे ग्रहों का प्रतिकूल प्रभाव हो, तो योग के सकारात्मक परिणाम कमजोर पड़ सकते हैं।
गुरु या चंद्रमा पर शनि, राहु, केतु या मंगल जैसे ग्रहों की प्रतिकूल दृष्टि या युति हो, तो कुछ ज्योतिषीय परंपराएं इसे योग की शक्ति में कमी मानती हैं।
· सही अवसर में देरी
· निर्णय लेने में असमंजस
· मेहनत के अनुपात में परिणाम का नहीं मिलना
· मान-सम्मान में रुकावट
गजकेसरी योग कमजोर होने का अर्थ यह नहीं कि कुंडली में सकारात्मक परिणाम नहीं होंगे। गुरु और चंद्रमा की वास्तविक शक्ति के साथ पूरी कुंडली की स्थिति महत्वपूर्ण है।
ज्योतिष में ग्रहों की महादशा और अंतर्दशा भी जरूरी है। गजकेसरी योग का प्रभाव कब और किस रूप में दिखाई देगा, इसे समझने के लिए दशा की स्थिति भी देखी जाती है।
किसी व्यक्ति की कुंडली में सफलता, धन, करियर या प्रतिष्ठा का आकलन केवल गजकेसरी योग से नहीं किया जाता। भाव, भावेश, ग्रहों की स्थिति, दृष्टि, युति और दशा समेत पूरी कुंडली का विश्लेषण किया जाता है।