रीता राय सागर
दादी-नानी के जमाने के मंगलसूत्र आज के डिजाइन से काफी अलग होते थे। कहीं काली मणियों के साथ सोने की वटी थी, तो कहीं पारंपरिक धार्मिक प्रतीकों वाले पेंडेंट।
महाराष्ट्र के पारंपरिक मंगलसूत्र में काली मणियों के साथ सोने की दो वटी खास पहचान रखती हैं। कटोरी जैसी दिखने वाली इन वटियों वाला डिजाइन आज भी पसंद किया जाता है।
तमिलनाडु में विवाह के पवित्र आभूषण को थाली कहा जाता है। पारंपरिक डिजाइनों में सोने के पेंडेंट पर धार्मिक आकृतियां बनाई जाती थीं। यही वजह है कि पुराने थाली डिजाइन अपनी अलग पहचान रखते हैं।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कई तेलुगु समुदायों में मंगलसूत्र के पेंडेंट को बोट्टू कहा जाता है। कुछ परंपराओं में दो पेंडेंट पहनने का चलन है। चेन की बनावट परिवार और समुदाय के अनुसार बदलती है।
गुजरात और राजस्थान में काली मणियों वाली चेन के साथ सोने का पेंडेंट पहनने का रिवाज है। कहीं डबल चेन पसंद की जाती है, तो कहीं छोटा पारंपरिक पेंडेंट।
गोवा और कोंकण की कुछ पारंपरिक वैवाहिक ज्वेलरी में कसिथाली जैसे डिजाइन मिलते हैं। कुछ रूपों में सोने के साथ लाल मूंगे जैसी मणियां और पेंडेंट होते हैं।
बंगाल में विवाहित महिलाओं के पारंपरिक गहनों में शंखा-पोला की खास जगह है। सफेद शंख से बनी चूड़ियां और लाल पोला वैवाहिक पहचान से जुड़े हैं।
कश्मीरी पंडित समुदाय में देज्होर विवाह से जुड़ा पारंपरिक आभूषण है, जिसे कान में पहना जाता है। इससे जुड़ी सोने की चेन भी पारंपरिक होती है।
बिहार के मिथिला की पारंपरिक ज्वेलरी में ढोलना का खास स्थान है। इसका पेंडेंट ढोल जैसी आकृति का होता है और इसे मोतियों के साथ भी बनाया जाता था। यह पारंपरिक वैवाहिक गहना है।
केरल में मिन्नू विवाह से जुड़ा पारंपरिक आभूषण है। इसके पारंपरिक रूप में पत्ती जैसी आकृति होती है। यह काली मणियों वाले मंगलसूत्र जैसा नहीं होता है।