अंकिता पटेल
नवरात्र में नौ दिन नौ देवियों की पूजा होती है और अष्टमी-नवमी पर नन्हीं कन्याओं की। माना जाता है कि दोनों के बीच गहरा संबंध है। जानिए यह परंपरा क्या कहती है।
परंपरा में छोटी कन्या को शक्ति का जीवंत रूप माना गया है। मान्यता है कि जो देवी नवरात्र में प्रतिमा या कलश में पूजी जाती हैं, वही कन्याओं के रूप में घर आती हैं।
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नवरात्र के नौ दिनों में शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की आराधना होती है। नौ कन्याओं को इन्हीं नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर पूजा जाता है।
आठवाँ दिन महागौरी को और नौवाँ दिन सिद्धिदात्री को समर्पित है। इसी कारण कन्या पूजन आमतौर पर इन्हीं दो तिथियों में होता है। यह नौ दिन की साधना की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है।
कुमारी पूजा की परंपरा में उम्र के आधार पर कन्याओं को देवी के अलग नाम दिए गए हैं। माना जाता है कि दो वर्ष की कन्या कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कल्याणी और पाँच वर्ष की रोहिणी का रूप होती है।
इसी क्रम में छह वर्ष की कन्या को कालिका, सात वर्ष की को चंडिका, आठ वर्ष की को शांभवी, नौ वर्ष की को दुर्गा और दस वर्ष की को सुभद्रा का रूप माना जाता है। ये नाम नवदुर्गा के नौ नामों से अलग हैं, पर भाव एक ही है।
कई घरों में कन्याओं के साथ एक छोटे बालक को भी बैठाया जाता है। उसे भैरव या लंगूर का रूप माना जाता है। मान्यता है कि देवी की पूजा के साथ उनके रक्षक की उपस्थिति भी जरूरी है।
कन्याओं के पैर जल से धोकर उन्हें आसन पर बैठाएँ। तिलक लगाएँ, मौली बाँधें और आरती करें। हलवा, पूरी और काले चने का भोग लगाएँ। फिर उपहार और दक्षिणा के साथ आशीर्वाद लेकर विदा करें।
कन्या पूजन बेटियों को देवी का रूप मानकर सम्मान देने की परंपरा है। यह याद दिलाता है कि जिस समाज में कन्या का आदर होता है, वही सच्चे अर्थों में शक्ति की उपासना करता है।