अंकिता पटेल
कन्या पूजन के बाद दक्षिणा देने की परंपरा है, पर हर साल यही सवाल उठता है कि राशि कितनी हो। जानिए परंपरा क्या कहती है और किन बातों का रखें ध्यान।
पूजा-पाठ में दक्षिणा कृतज्ञता और सम्मान की भेंट मानी जाती है। कन्या पूजन में कन्याओं को देवी का रूप मानकर भोजन के बाद दक्षिणा देने का चलन है। इसे पूजन की पूर्णता से जोड़कर देखा जाता है।
कन्या पूजन की दक्षिणा की कोई निश्चित राशि शास्त्रों में तय नहीं बताई जाती। यह पूरी तरह श्रद्धा और अपनी सामर्थ्य पर निर्भर है। इसलिए किसी दबाव या दिखावे में आने की जरूरत नहीं है।
लोक-परंपरा में 11, 21, 51 या 101 रुपये जैसी राशियाँ आम तौर पर दी जाती हैं। इनमें अंत में एक रुपये का जुड़ना शुभता का प्रतीक माना जाता है। कुछ परिवार इससे अलग अपनी सामर्थ्य के अनुसार भी राशि देते हैं।
मान्यता है कि छोटी राशि भी सच्चे भाव से दी जाए, तो वही सबसे बड़ी भेंट है। बड़ी राशि का दिखावा करने या उधार लेकर देने की कोई ज़रूरत नहीं। श्रद्धा और सम्मान ही इस परंपरा का सार है।
पूजन में शामिल सभी कन्याओं को एक समान दक्षिणा देना उचित माना जाता है। इससे किसी बच्ची में भेदभाव की भावना नहीं आती और सभी को देवी का रूप मानने का भाव भी बना रहता है।
परंपरा में भोजन के बाद कन्याओं के चरण छूकर और तिलक लगाकर दक्षिणा दी जाती है। इसे लाल कपड़े, रुमाल या लिफाफे में रखकर देना अच्छा माना जाता है। देते समय चेहरे पर प्रेम और नम्रता का भाव रखें।
कई घरों में दक्षिणा के साथ चुनरी, चूड़ियाँ, खिलौने, किताबें या स्टेशनरी भी दी जाती है। बच्चियों के लिए उपयोगी उपहार चुनना बेहतर रहता है। नकद और उपहार का अनुपात अपनी सुविधा से तय करें।
कन्याओं को सम्मान से बुलाएँ और उन्हें थकाएँ नहीं। भोजन में बच्चों की पसंद और एलर्जी का ध्यान रखें। दक्षिणा सीधे बच्ची के हाथ में या उसके अभिभावक की मौजूदगी में दें और तस्वीरें लेने से पहले अनुमति जरूर लें।
कन्या पूजन का मर्म दक्षिणा की राशि नहीं, बेटियों के प्रति आदर है। इस नवरात्र उन्हें शिक्षा और बराबरी का अवसर देने का संकल्प भी लें।