अंकिता पटेल
भारत में हजारों वर्षों से शक्ति की उपासना की परंपरा रही है। मान्यता है कि नवदुर्गा के नौ रूपों का संबंध नौ औषधीय वनस्पतियों से भी है।
शैलपुत्री का संबंध हरड़ से बताया गया है। आयुर्वेद में हरड़ को पाचन और शरीर के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना जाता है।
ब्रह्मचारिणी का संबंध ब्राह्मी से जोड़ा गया है। पारंपरिक आयुर्वेद में ब्राह्मी का उपयोग स्मरणशक्ति और मानसिक स्वास्थ्य के लिए किया जाता है।
चंद्रघंटा का संबंध चंद्रशूर नामक पौधे से बताया गया है। इसके पत्तों का साग बनाया जाता है और इसके बीजों का उपयोग भी पारंपरिक आहार में होता है।
कूष्मांडा का संबंध सफेद पेठे यानी कुम्हड़े से है। पारंपरिक मान्यताओं में इसे पौष्टिक, पाचन में सहायक और शरीर को ऊर्जा देने वाला माना गया है।
स्कंदमाता का संबंध अलसी यानी जवस से बताया गया है। अलसी में ओमेगा-3 फैटी एसिड और फाइबर होता है, जो संतुलित आहार का उपयोगी हिस्सा है।
कात्यायनी का संबंध अंबाड़ी नामक पौधे से जोड़ा गया है। इसकी पत्तियों का उपयोग कई क्षेत्रों में साग बनाने के लिए किया जाता है।
कालरात्रि का संबंध नागदौन नामक वनस्पति से बताया गया है। पारंपरिक मान्यताओं में इस पौधे को रोगों से बचाव और सुख-समृद्धि से जोड़ा जाता है।
महागौरी का संबंध तुलसी से बताया गया है। तुलसी भारतीय परंपरा में पूजनीय है और इसका उपयोग घरेलू नुस्खों में भी लंबे समय से होता आया है।
सिद्धिदात्री का संबंध शतावरी से जोड़ा गया है। आयुर्वेद में शतावरी का पारंपरिक उपयोग शरीर के पोषण और स्वास्थ्य संबंधी देखभाल के लिए किया जाता है।
नवदुर्गा के नौ रूपों और नौ औषधीय पौधों का यह संबंध पारंपरिक धार्मिक मान्यता का हिस्सा है। किसी बीमारी के इलाज के लिए औषधियों का उपयोग विशेषज्ञ की सलाह से ही करें।