अंकिता पटेल
माना जाता है कि नवरात्र की पूजा कन्या पूजन के बिना अधूरी रहती है। जानिए यह परंपरा कब निभाई जाती है, इसके पीछे की मान्यता क्या है और पूजन कैसे करें।
परंपरा में कन्या पूजन अष्टमी या नवमी तिथि को किया जाता है। जो भक्त पूरे नौ दिन व्रत रखते हैं, वे आमतौर पर इन्हीं दो दिनों में से किसी एक दिन पूजन कर व्रत का समापन करते हैं।
मान्यता है कि छोटी कन्याओं में माँ दुर्गा का वास होता है। नवरात्र में नौ देवियों की आराधना की जाती है, इसलिए नौ कन्याओं को नवदुर्गा का प्रतीक मानकर पूजा जाता है।
सामान्य मान्यता के अनुसार नौ कन्याओं का पूजन किया जाता है, जो नौ देवी स्वरूपों का प्रतीक हैं। साथ में एक बालक को भी बैठाने की परंपरा है, जिसे भैरव या लंगूर का रूप माना जाता है।
आमतौर पर लगभग दो से दस वर्ष की कन्याओं को पूजन के लिए बुलाया जाता है। शास्त्रीय और लोक-परंपरा में अलग-अलग आयु की कन्याओं को देवी के अलग-अलग रूप से जोड़ा गया है।
एक दिन पहले कन्याओं को सम्मान के साथ आमंत्रित करें। पूजन के दिन घर और पूजा स्थान को साफ़ रखें। हलवा, काले चने और पूरी का प्रसाद तैयार करें, जो इस अवसर का पारंपरिक भोग माना जाता है।
कन्याओं के पैर जल से धोकर उन्हें आसन पर बैठाएँ। माथे पर तिलक या रोली लगाएँ, कलाई पर मौली बाँधें और दीप दिखाकर आरती करें। फिर श्रद्धा से भोजन कराएँ और प्रेमपूर्वक उनका आशीर्वाद लें।
भोजन के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार कोई उपहार या दक्षिणा दी जाती है। इसमें कपड़े, चूड़ियाँ, खिलौने, फल, पुस्तकें या स्टेशनरी जैसी चीज़ें शामिल की जा सकती हैं।
मान्यता है कि सच्चे मन से किया गया कन्या पूजन घर में सुख, शांति और समृद्धि लाता है। इसे व्रत की पूर्णता का प्रतीक भी माना जाता है। हालाँकि यह आस्था का विषय है।
कन्या पूजन सिर्फ एक दिन की रस्म नहीं, बेटियों के प्रति आदर का संदेश भी है। इस नवरात्र बेटियों को शिक्षा, सुरक्षा और बराबरी का अवसर देने का संकल्प भी लें।