रीता राय सागर
क्या आपने कभी सोचा है कि गणेश जी की सूंड बांई ओर ही क्यों होती है। इसका संबंध धार्मिक मान्यता और चंद्र नाड़ी में छिपा है।
गणेश जी की बाईं ओर मुड़ी सूंड वाली प्रतिमा को शांत, सौम्य और प्रसन्न स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। ऐसी प्रतिमा घर में रखना शुभ माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं में गणपति की बाईं ओर मुड़ी सूंड को चंद्र नाड़ी से जोड़ा जाता है। जैसे चंद्रमा को शीतलता और शांति का प्रतीक माना जाता है, वैसे ही गजानन भी शांति का प्रतीक है।
बाईं ओर सूंड वाली गणेश प्रतिमा को घर में सुख, शांति और आनंद से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि घरों में इस स्वरूप की प्रतिमा अधिक देखने को मिलती है।
मान्यता है कि बाईं ओर सूंड वाले गणेश जी की पूजा के लिए बहुत कठिन नियमों का पालन करना जरूरी नहीं होता। केवल श्रद्धा और स्वच्छता के साथ नियमित पूजा की जाती है।
गणपति की जिन मूर्तियों में सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई होती है, उसे सूर्य नाड़ी से जोड़ा जाता है। ऐसी प्रतिमा की पूजा में नियमों का अधिक ध्यान रखने की आवश्यकता होती है।
घर में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करने के लिए आमतौर पर बाईं ओर की सूंड वाले गणपति को शुभ माना जाता है। इन्हें सौम्य और गृहस्थ जीवन के अनुकूल माना जाता है।
बाईं ओर सूंड वाले गणपति की प्रतिमाएं घरों के अलावा मंदिरों और पूजा स्थलों में भी आसानी से देखने को मिलती हैं। भक्त इन्हें सुख-समृद्धि और मंगल का प्रतीक मानते हैं।
गणेश जी की प्रतिमा के स्वरूप से जुड़ी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं हैं। लेकिन पूजा में श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक भाव को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।
गणपति के जिस भी स्वरूप की पूजा करें, मन में श्रद्धा रखें। मान्यता है कि विघ्नहर्ता गणेश जी की आराधना से जीवन में सुख, शांति और मंगल की कामना की जाती है।