अंकिता पटेल
TDS यानी टोटल डिजॉल्व्ड सॉलिड्स, पानी में घुले उन सभी कणों की कुल मात्रा, जो आंखों से नजर नहीं आते। इनमें कैल्शियम और मैग्नीशियम के साथ सोडियम, क्लोराइड और सल्फेट जैसे तत्व भी शामिल होते हैं।
इसकी इकाई PPM (पार्ट्स पर मिलियन) या mg/L होती है। जितना ज्यादा PPM, उतने ज्यादा घुले हुए कण। घर पर एक छोटे-से डिजिटल TDS मीटर से यह आंकड़ा सेकंडों में देखा जा सकता है।
पीने के पानी के लिए 50 से 150 PPM की रेंज को आदर्श माना जाता है। इस दायरे में पानी का स्वाद संतुलित रहता है और शरीर के लिए जरूरी मिनरल्स भी मौजूद रहते हैं।
300 PPM तक पानी आम तौर पर ठीक माना जाता है। इससे ऊपर जाने पर स्वाद बदलने लगता है। भारतीय मानक के अनुसार 500 PPM तक की सीमा स्वीकार्य है।
ऊंचे TDS वाले पानी में क्लोराइड और सल्फेट जैसे तत्व पाइप और उपकरणों में जंग लगा सकते हैं। नल, गीजर और वॉशिंग मशीन में सफेद परत जमने लगती है, जिससे इनकी उम्र और कार्यक्षमता घटती है।
बहुत नमकीन या कड़वा स्वाद, केमिकल जैसी गंध, या पानी का धुंधला और पीला रंग, ये सब खराब क्वालिटी के संकेत हो सकते हैं। ऐसे पानी को बिना जांच पिएं नहीं और जरूरत हो तो प्यूरीफायर का सहारा लें।
TDS मीटर सिर्फ घुले हुए कणों की कुल मात्रा बताता है। यह बैक्टीरिया, आर्सेनिक, फ्लोराइड या कीटनाशक जैसे हानिकारक तत्वों की जानकारी नहीं देता।
RO प्यूरीफायर TDS को काफी घटा देता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा फिल्टर किया गया पानी उपयोगी मिनरल्स भी खो देता है। अगर आपके पानी का TDS पहले से कम है, तो RO की जरूरत ही नहीं पड़ती।
घर में TDS मीटर रखें, नियमित जांच करें और अपने पानी के स्रोत के हिसाब से सही फिल्टर चुनें। याद रखें, सिर्फ साफ दिखना काफी नहीं, पानी का संतुलित होना भी उतना ही जरूरी है।