अंकिता पटेल
अल्युमिनियम एक रिएक्टिव मेटल है, यानी यह खाने के संपर्क में आने पर आसानी से उसके साथ प्रतिक्रिया कर सकता है, खासकर तब जब बर्तन पुराना या घिसा हुआ हो।
टमाटर, नींबू, इमली या सिरके जैसे एसिडिक फूड को अल्युमिनियम के बर्तन में पकाने पर धातु के कण खाने में घुलने (लीचिंग) की संभावना काफी बढ़ जाती है।
सिर्फ खट्टा ही नहीं, ज्यादा नमक वाला खाना बनाने पर भी अल्युमिनियम के कण भोजन में मिलने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
सेहतमंद व्यक्ति के शरीर से करीब 99% अल्युमिनियम किडनी के जरिए बाहर निकल जाता है, लेकिन किडनी की बीमारी से जूझ रहे लोगों में यह शरीर में जमा होकर परेशानी बढ़ा सकता है।
जिन बर्तनों की सतह पर खरोंच, गड्ढे या घिसावट आ चुकी हो, उनमें लीचिंग की दर नए और अच्छी हालत वाले बर्तनों के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है।
कुछ पुराने अध्ययनों में अल्युमिनियम को Alzheimer से जोड़ा गया था, लेकिन प्रमुख स्वास्थ्य संस्थाओं के मुताबिक अब तक इसका कोई ठोस और निर्णायक वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है।
बार-बार अल्युमिनियम के बर्तन में खाना बनाने से खाने का स्वाद और उसमें मौजूद कुछ पोषक तत्वों की गुणवत्ता पर भी हल्का असर पड़ सकता है।
सिर्फ बर्तन ही नहीं, गर्म और खट्टे खाने को अल्युमिनियम फॉयल में लपेटने से भी उसमें धातु के कण मिलने की आशंका रहती है।
स्टेनलेस स्टील, कच्चा लोहा (कास्ट आयरन) या कांच के बर्तन एसिडिक और नमकीन खाना पकाने के लिए ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं, क्योंकि इनमें धातु के रिसाव का खतरा काफी कम होता है।