अंकिता पटेल
भारतीय परंपरा में चांदी की बिछिया विवाहित महिलाओं के श्रृंगार का अहम हिस्सा मानी जाती है। इसे दोनों पैरों की दूसरी उंगली में पहना जाता है, और यह सुहाग का प्रतीक समझी जाती है।
ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, किसी भी नई चीज की शुरुआत शुभ मुहूर्त में करना बेहतर माना जाता है। इसलिए विवाह के समय पंडित या ज्योतिषी से सलाह लेकर ही बिछिया पहनाने का समय तय किया जाता है।
परंपरा के अनुसार, दुल्हन को सबसे पहली बिछिया उसकी शादी के दिन ही पहनाई जाती है, आमतौर पर यह रस्म सुहागरात से पहले या विवाह की अन्य रस्मों के दौरान पूरी की जाती है।
पारंपरिक मान्यताओं में गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति ग्रह से जुड़ा माना जाता है, इसलिए नई ज्वेलरी या बिछिया पहनने के लिए इस दिन को अक्सर शुभ माना जाता है।
कुछ मान्यताओं के अनुसार सोमवार का दिन भी नई शुरुआत और श्रृंगार से जुड़ी चीजों के लिए अनुकूल माना जाता है, खासतौर पर अगर व्यक्ति चंद्रमा से जुड़े शुभ प्रभाव में विश्वास रखता हो।
अक्षय तृतीया शुभ
अक्षय तृतीया, धनतेरस और दिवाली जैसे शुभ अवसरों को भी नई ज्वेलरी और बिछिया पहनने के लिए खास माना जाता है, क्योंकि इन दिनों किए गए कार्यों को स्थायी और शुभ फलदायक समझा जाता है।
बिछिया के लिए खासतौर पर चांदी धातु को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि यह एक अच्छा कंडक्टर मानी जाती है। चांदी शरीर के भीतर ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित रखने में मदद करती है।
हर व्यक्ति की जन्म कुंडली अलग होती है, इसलिए कई लोग बिछिया पहनने का सही दिन तय करने के लिए अपने व्यक्तिगत ज्योतिषी से सलाह लेना बेहतर समझते हैं।
आखिरकार, बिछिया पहनने का दिन चुनना पूरी तरह व्यक्ति की आस्था, पारिवारिक परंपरा और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों पर निर्भर करता है।