अंकिता पटेल
विजयादशमी के दिन कई घरों में एक हरे पत्ते को सोना कहकर बाँटा जाता है। यह है आपटा, जिसे सोनपत्ता भी कहते हैं। जानिए इसका महत्व, इससे जुड़ी कथा और दशहरे की मान्यताएँ।
आपटा एक मध्यम आकार का पेड़ है, जिसका वानस्पतिक नाम बौहिनिया रेसिमोसा है। इसकी पत्तियाँ दो पालियों में बँटी होती हैं। मराठी में आपटा, तो मध्य भारत के कई हिस्सों में यह सोनपत्ता कहलाता है।
विजयादशमी के दिन लोग आपटा के पत्ते एक-दूसरे को देकर शुभकामनाएँ देते हैं। बड़ों के पैर छूकर पत्ते अर्पित किए जाते हैं। मराठी भाषा में प्रचलित कहावत का भाव है, "सोना लो, सोने जैसे बने रहो।"
लोककथा के अनुसार ऋषि वरतंतु के शिष्य कौत्स गुरुदक्षिणा चुकाने के लिए अयोध्या के राजा रघु के पास पहुँचे। राजा का खजाना खाली था, इसलिए उन्होंने कुबेर से सहायता माँगी। माना जाता है कि कुबेर ने शमी और आपटा के पेड़ों पर सोने की मुहरों की वर्षा की।
शमी का पेड़ पांडवों की कथा से जुड़ा है। माना जाता है कि अज्ञातवास में उन्होंने अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के पेड़ पर छिपाए थे और विजयादशमी के दिन उसकी पूजा कर उन्हें वापस लिया।
दशहरे की शाम कई जगह लोग गाँव या नगर की सीमा तक जाते हैं, इसे सीमोल्लंघन कहते हैं। माना जाता है कि मराठा काल में सेनाएँ विजयादशमी के बाद अभियान पर निकलती थीं।
आपटा को अंग्रेज़ी में "बीड़ी पत्ता वृक्ष" भी कहा जाता है, क्योंकि इसके पत्ते बीड़ी लपेटने में इस्तेमाल होते रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में इसकी पत्तियाँ पत्तल बनाने और पशुओं के चारे के काम भी आती हैं।
माना जाता है कि आपटा के पत्ते देने-लेने से सुख, समृद्धि और आपसी प्रेम बढ़ता है। कई परिवार पत्तों को पूजा स्थल पर, तिजोरी में या घर के दरवाज़े पर शुभ चिह्न के रूप में रखते हैं।
हर साल त्योहार पर पत्तों की माँग बढ़ने से पेड़ों की टहनियाँ तोड़ दी जाती हैं। इससे पेड़ को नुकसान पहुँचता है। जरूरत भर के कुछ पत्ते ही तोड़ें, टहनी न काटें और हो सके तो नया पौधा लगाएँ।
आपटा का पत्ता भले ही सोना न हो, पर उसके साथ दिया गया संदेश सोने से कम नहीं। अपनों को पत्ता दीजिए और प्रेम, सम्मान तथा अच्छाई की जीत का संकल्प भी लीजिए।