Highlights
ट्रंप ने मोहम्मद नाम को लेकर 65 फीसदी संभावना का दावा किया।
ईरान में राष्ट्रपति पद को लेकर ट्रंप ने कसा तंज।
रैली में ट्रंप की टिप्पणी पर मिली ठंडी प्रतिक्रिया।
मुस्लिम समुदाय पर बयानबाजी को लेकर ट्रंप की आलोचना।
रिपोर्ट में अमेरिका में बढ़ते इस्लामोफोबिया पर जताई गई चिंता।
Donald Trump Mockery Name Mohammed: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के राष्ट्रपति पद और मुस्लिम समुदाय में मोहम्मद नाम की लोकप्रियता को लेकर मजाक किया है। शुक्रवार को जॉर्जिया के डाल्टन में एक चुनावी रैली के दौरान ट्रंप की इस टिप्पणी पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। मुस्लिम समुदाय और मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने पहले भी ट्रंप की बयानबाजी की आलोचना की है।
समाचार रिपोर्ट के मुताबिक, डाल्टन म्यूनिसिपल एयरपोर्ट के एक हैंगर में आयोजित रैली को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि अगर मध्य पूर्व के किसी व्यक्ति के नाम को लेकर संदेह हो, तो उसे 'मोहम्मद' कहकर बुला सकते हैं। उन्होंने दावा किया कि ऐसा करने पर लगभग 65 प्रतिशत संभावना है कि नाम सही होगा।
ट्रंप ने यह भी कहा कि वह कई वर्षों से ऐसा करते आ रहे हैं और कभी गलत नहीं हुए। मोहम्मद नाम मुस्लिम समुदाय में बेहद लोकप्रिय है। कई मुस्लिम परिवार अपने बेटों का नाम इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद के नाम पर रखते हैं।
ईरान का जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहां कोई भी राष्ट्रपति नहीं बनना चाहता। इसके बाद उन्होंने मोहम्मद नाम वाले कई काल्पनिक लोगों से राष्ट्रपति पद संभालने की इच्छा को लेकर सवाल करने का अभिनय किया। हालांकि, रैली में मौजूद लोगों की प्रतिक्रिया बहुत उत्साहजनक नहीं रही।
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन वर्ष 2024 से इस पद पर हैं। ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब अमेरिका में मध्यावधि चुनावों के लिए प्रचार अभियान चल रहा है।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और मुस्लिम संगठनों ने ट्रंप पर मुस्लिमों, प्रवासियों और जातीय अल्पसंख्यकों का मजाक उड़ाने तथा उनके प्रति नकारात्मक धारणा बढ़ाने का आरोप लगाया है। आलोचकों के अनुसार, चुनाव प्रचार के दौरान सोमाली और मुस्लिम अमेरिकी समुदायों को लेकर उनकी बयानबाजी और तीखी हुई है।
रैली में ट्रंप ने यह भी दोहराया कि ईरान को कभी परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा। इससे पहले अमेरिका और इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को कमजोर करने के उद्देश्य से सैन्य कार्रवाई की थी। वहीं, काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस की एक वार्षिक रिपोर्ट में अमेरिका में बढ़ते इस्लामोफोबिया के लिए आव्रजन पर सख्ती और फलस्तीन समर्थक प्रदर्शनों पर कार्रवाई को भी जिम्मेदार बताया गया था।