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उत्तर प्रदेश

Explainer: यूपी चुनाव में किसकी नैया के खेवनहार बनेंगे मल्लाह, किन सीटों पर है मजबूत पकड़? जानें पूरा समीकरण

UP Election 2027: यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मल्लाह-निषाद समाज सियासत के केंद्र में है। आरक्षण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आजीविका के मुद्दों पर BJP, सपा और क्षेत्रीय दलों की नजर है।

अर्पित शुक्ला

Highlights

  • यूपी की करीब 160 विधानसभा सीटों पर निषाद समाज के प्रभाव का दावा, 50 से 80 सीटों पर अहम भूमिका के अनुमान।

  • संजय निषाद से मुकेश सहनी तक, कई नेता आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे उठा रहे हैं।

  • SC आरक्षण, पारंपरिक आजीविका और सत्ता में भागीदारी 2027 से पहले समुदाय के प्रमुख मुद्दे हैं।

Mallah Nishad Samaj Vote Bank: गंगा और सरयू की लहरों के बीच अपनी पहचान गढ़ने वाला मल्लाह-निषाद समाज, उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछने से पहले ही सियासत के केंद्र में आ गया है। आबादी के आंकड़ों के तराजू पर भले ही यह समुदाय सूबे के सबसे बड़े सामाजिक समूहों में शामिल न दिखता हो, लेकिन पूर्वांचल से लेकर मध्य यूपी तक फैली नदियों के किनारे बसे इलाकों में इसकी मौजूदगी किसी भी चुनावी समीकरण को बनाने और बिगाड़ने का दम रखती है।

यही वजह है कि क्या भाजपा, क्या समाजवादी पार्टी और क्या निषाद समाज की नुमाइंदगी करने वाले क्षेत्रीय दल, हर किसी की निगाहें इस वोट बैंक को साधने पर टिकी हैं। आरक्षण का वर्षों पुराना सवाल, पारंपरिक आजीविका का संकट और सत्ता के गलियारों में नुमाइंदगी की चाह ने इस समाज की सियासी अहमियत को और बढ़ा दिया है।

आबादी और सामाजिक ताना-बाना

लेकिन सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समाज का वजन कितना है? इस सवाल का जवाब खोजते ही आबादी के अलग-अलग अनुमानों का दौर शुरू हो जाता है।

राजनीतिक गलियारों के कुछ अनुमानों में मल्लाह-निषाद समाज की हिस्सेदारी करीब 5 से 6 फीसदी मानी जाती है। वहीं, अगर इस व्यापक समूह में केवट, बिंद, कश्यप, बाथम, मांझी और नदियों पर आश्रित अन्य जातियों को एक साथ जोड़कर देखा जाए, तो यह आंकड़ा और बड़ा नजर आने लगता है। हालांकि, इन तमाम समुदायों की कोई एक सर्वमान्य या आधिकारिक आबादी का आंकड़ा आज भी उपलब्ध नहीं है।

सामाजिक ताने-बाने की बात करें, तो इस पूरे समुदाय को व्यापक रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के तहत रखा गया है। उत्तर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में यह समाज मल्लाह, निषाद, केवट, बिंद, मांझी, बाथम, धीमर, धीवर, तुरैहा और कश्यप जैसे नामों से जाना जाता है, जिनकी स्थानीय सामाजिक स्थिति और पहचान क्षेत्र के हिसाब से अपनी-अपनी तरह की है।

मल्लाह समाज की सत्ता में कितनी भागेदारी?

मल्लाह-निषाद समाज की राजनीतिक ताकत का आकलन केवल आबादी के आधार पर नहीं किया जा सकता। किसी विधानसभा क्षेत्र में उम्मीदवार की लोकप्रियता, स्थानीय नेतृत्व, दूसरे पिछड़े वर्गों के साथ सामाजिक समीकरण और राजनीतिक गठबंधन भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं।

समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं की संख्या और सत्ता में उनकी भागीदारी भी इस चर्चा का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश में निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। वहीं, बीजेपी और समाजवादी पार्टी में भी निषाद, बिंद और संबंधित समुदायों से आने वाले नेता सक्रिय हैं।

लोकसभा स्तर पर भी इस समुदाय से जुड़े नेता अलग-अलग दलों का प्रतिनिधित्व करते हैं। बीजेपी और सपा, दोनों के पास निषाद समुदाय से जुड़े सांसद और विधायक रहे हैं।

संजय निषाद से लेकर मुकेश सहनी तक, समाज के कई नेता

उत्तर प्रदेश में निषाद राजनीति का प्रमुख चेहरा संजय निषाद हैं। उनकी निषाद पार्टी NDA का हिस्सा है। पार्टी लंबे समय से निषाद समुदाय की कुछ उपजातियों को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा देने और आरक्षण से जुड़े मुद्दे उठाती रही है।

बीजेपी के लिए निषाद समाज पूर्वांचल में अपने OBC समर्थन आधार को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है। वहीं, समाजवादी पार्टी भी निषाद और बिंद समुदाय से जुड़े नेताओं के जरिए अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश करती रही है।

कांग्रेस भी निषाद समुदाय के नेताओं को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इसके अलावा, बिहार की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी भी उत्तर प्रदेश में निषाद राजनीति को विस्तार देने में जुटे हैं। उनकी पार्टी आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दों को प्रमुखता देती रही है।

कितनी सीटों पर है मल्लाह वोट का प्रभाव?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कुल 403 सीटें हैं। निषाद समाज के नेताओं और विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुमानों के मुताबिक, करीब 160 सीटों पर इस समुदाय का कुछ न कुछ प्रभाव माना जाता है। इनमें लगभग 50 से 80 सीटें ऐसी बताई जाती हैं, जहां इसकी मौजूदगी चुनावी नतीजों के लिहाज से अहम हो सकती है।

समुदाय के प्रतिनिधियों का दावा है कि कुछ सीटों पर निषाद मतदाताओं की संख्या 60 हजार से एक लाख तक हो सकती है। हालांकि, ये आंकड़े राजनीतिक दावों और अनुमानों पर आधारित हैं।

पूर्वांचल और मध्य उत्तर प्रदेश के कई जिलों में मल्लाह-निषाद मतदाताओं की अच्छी मौजूदगी मानी जाती है। इनमें गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, मऊ, संतकबीरनगर, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, प्रयागराज और फतेहपुर जैसे जिले शामिल हैं। कुछ अन्य इलाकों में भी यह समुदाय स्थानीय चुनावी समीकरणों को प्रभावित करता है।

SC आरक्षण की मांग क्यों है अहम?

मल्लाह-निषाद समुदाय की प्रमुख मांगों में कुछ उपजातियों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने और आरक्षण का लाभ दिलाने का मुद्दा शामिल है। निषाद पार्टी लंबे समय से इस मांग को उठाती रही है। समुदाय के नेताओं का कहना है कि आरक्षण से जुड़ा फैसला उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधार लाने में मदद कर सकता है।

इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों और समुदाय के संगठनों के बीच लंबे समय से चर्चा होती रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मांग फिर राजनीतिक बहस का हिस्सा बन सकती है।

चुनाव से पहले क्यों बढ़ी सियासी हलचल?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दल अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने में जुटे हैं। बीजेपी के लिए निषाद समाज की अहमियत पूर्वांचल में गठबंधन और OBC राजनीति से जुड़ी है। समाजवादी पार्टी भी समुदाय के नेताओं और स्थानीय समीकरणों के जरिए अपनी पहुंच बढ़ाना चाहती है। वहीं, निषाद पार्टी और VIP जैसे संगठन आरक्षण, आजीविका और प्रतिनिधित्व के सवालों पर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

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