No Cost EMI Reality: त्योहारों के सीजन और ऑनलाइन सेल के दौरान नो कॉस्ट EMI का ऑफर ग्राहकों को काफी आकर्षित करता है। कंपनियां इसे जीरो प्रतिशत ब्याज वाली आसान खरीदारी के रूप में पेश करती हैं, लेकिन इसके पीछे कई ऐसे खर्च हो सकते हैं जिन्हें समझना जरूरी है।
भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार बैंकिंग व्यवस्था में लोन पूरी तरह बिना लागत के नहीं होता। ऐसे में नो कॉस्ट EMI में ब्याज की राशि को अलग तरीके से एडजस्ट किया जा सकता है, जबकि प्रोसेसिंग फीस और टैक्स जैसे अतिरिक्त शुल्क भी ग्राहक को चुकाने पड़ सकते हैं।
नो कॉस्ट EMI में बैंक ग्राहक से ब्याज ले सकता है, लेकिन कई मामलों में मर्चेंट या विक्रेता उत्पाद की कीमत पर डिस्काउंट देकर इस ब्याज की भरपाई करता है। इसी व्यवस्था को नो कॉस्ट EMI के रूप में प्रचारित किया जाता है।
इसका मतलब यह भी हो सकता है कि अगर ग्राहक एकमुश्त भुगतान करता, तो उसे उत्पाद पर मिलने वाला डिस्काउंट अलग रूप में प्राप्त होता। इसलिए खरीदारी से पहले कैश पेमेंट और EMI दोनों विकल्पों की अंतिम कीमत की तुलना करना जरूरी है।
ग्राहकों को केवल मासिक किस्त देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। कुल भुगतान राशि, उपलब्ध कैश डिस्काउंट और EMI के साथ लगने वाले सभी शुल्कों को ध्यान में रखना अधिक समझदारी है।
नो कॉस्ट EMI को एक्टिव करने के लिए बैंक या वित्तीय संस्थान प्रोसेसिंग फीस भी ले सकते हैं। यह शुल्क अलग-अलग बैंकों और ऑफर के अनुसार बदलता है और आमतौर पर 99 रुपये से लेकर 299 रुपये या उससे अधिक हो सकता है।
कई ग्राहक विज्ञापन में केवल जीरो प्रतिशत ब्याज देखते हैं और प्रोसेसिंग फीस पर ध्यान नहीं देते। हालांकि यह राशि छोटी दिख सकती है, लेकिन खरीदारी की कुल लागत में इसका असर पड़ता है।
इसलिए EMI चुनने से पहले पेमेंट पेज और लोन एग्रीमेंट में लिखे सभी शुल्कों को ध्यान से पढ़ना जरूरी है।
नो कॉस्ट EMI का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू टैक्स है। लोन या वित्तीय सेवाओं से जुड़े कुछ शुल्कों और ब्याज संबंधी कंपोनेंट पर लागू GST के कारण ग्राहक को अतिरिक्त भुगतान करना पड़ सकता है।
वर्तमान में वित्तीय सेवाओं की कुछ फीस पर 18 प्रतिशत GST लागू होता है। इसलिए प्रोसेसिंग फीस जैसी राशि पर टैक्स जुड़ने से खरीदारी की अंतिम लागत बढ़ सकती है।
ग्राहकों को यह समझना चाहिए कि नो कॉस्ट EMI का मतलब हर परिस्थिति में पूरी तरह बिना किसी अतिरिक्त खर्च के खरीदारी नहीं होता।
किसी भी उत्पाद को खरीदने से पहले उसकी एकमुश्त भुगतान कीमत और EMI की कुल कीमत की तुलना जरूर करें। प्रोसेसिंग फीस, GST और अन्य संभावित शुल्कों को भी अंतिम भुगतान में शामिल करें।
सिर्फ कम मासिक किस्त देखकर गैर-जरूरी खरीदारी करने से बचें। अपनी मासिक आय और पहले से चल रही EMI को ध्यान में रखकर ही नया वित्तीय फैसला करें।
नो कॉस्ट EMI एक सुविधाजनक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक लागत समझना जरूरी है। सही जानकारी और सावधानी के साथ खरीदारी करने से ग्राहक छिपे हुए खर्चों और अनावश्यक कर्ज के बोझ से बच सकते हैं।