नो कॉस्ट EMI  (सोर्स- सोशल मीडिया)
यूटिलिटी

No Cost EMI: नो कॉस्ट EMI का पूरा सच, जानिए छिपे ब्याज और GST का असली गणित

No Cost EMI: त्योहारों के सीजन में जीरो परसेंट ब्याज का दावा करने वाले नो कॉस्ट EMI ऑफर का पूरा गणित समझें ताकि आप बैंकों के छिपे हुए ब्याज, प्रोसेसिंग फीस और 18% GST के जाल से बच सकें।

प्रिया सिंह

No Cost EMI Reality: त्योहारों के सीजन और ऑनलाइन सेल के दौरान नो कॉस्ट EMI का ऑफर ग्राहकों को काफी आकर्षित करता है। कंपनियां इसे जीरो प्रतिशत ब्याज वाली आसान खरीदारी के रूप में पेश करती हैं, लेकिन इसके पीछे कई ऐसे खर्च हो सकते हैं जिन्हें समझना जरूरी है।

भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार बैंकिंग व्यवस्था में लोन पूरी तरह बिना लागत के नहीं होता। ऐसे में नो कॉस्ट EMI में ब्याज की राशि को अलग तरीके से एडजस्ट किया जा सकता है, जबकि प्रोसेसिंग फीस और टैक्स जैसे अतिरिक्त शुल्क भी ग्राहक को चुकाने पड़ सकते हैं।

अपफ्रंट डिस्काउंट से कैसे एडजस्ट होता है ब्याज?

नो कॉस्ट EMI में बैंक ग्राहक से ब्याज ले सकता है, लेकिन कई मामलों में मर्चेंट या विक्रेता उत्पाद की कीमत पर डिस्काउंट देकर इस ब्याज की भरपाई करता है। इसी व्यवस्था को नो कॉस्ट EMI के रूप में प्रचारित किया जाता है।

इसका मतलब यह भी हो सकता है कि अगर ग्राहक एकमुश्त भुगतान करता, तो उसे उत्पाद पर मिलने वाला डिस्काउंट अलग रूप में प्राप्त होता। इसलिए खरीदारी से पहले कैश पेमेंट और EMI दोनों विकल्पों की अंतिम कीमत की तुलना करना जरूरी है।

ग्राहकों को केवल मासिक किस्त देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। कुल भुगतान राशि, उपलब्ध कैश डिस्काउंट और EMI के साथ लगने वाले सभी शुल्कों को ध्यान में रखना अधिक समझदारी है।

प्रोसेसिंग फीस बढ़ा सकती है कुल खर्च

नो कॉस्ट EMI को एक्टिव करने के लिए बैंक या वित्तीय संस्थान प्रोसेसिंग फीस भी ले सकते हैं। यह शुल्क अलग-अलग बैंकों और ऑफर के अनुसार बदलता है और आमतौर पर 99 रुपये से लेकर 299 रुपये या उससे अधिक हो सकता है।

कई ग्राहक विज्ञापन में केवल जीरो प्रतिशत ब्याज देखते हैं और प्रोसेसिंग फीस पर ध्यान नहीं देते। हालांकि यह राशि छोटी दिख सकती है, लेकिन खरीदारी की कुल लागत में इसका असर पड़ता है।

इसलिए EMI चुनने से पहले पेमेंट पेज और लोन एग्रीमेंट में लिखे सभी शुल्कों को ध्यान से पढ़ना जरूरी है।

ब्याज और फीस पर GST का असर

नो कॉस्ट EMI का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू टैक्स है। लोन या वित्तीय सेवाओं से जुड़े कुछ शुल्कों और ब्याज संबंधी कंपोनेंट पर लागू GST के कारण ग्राहक को अतिरिक्त भुगतान करना पड़ सकता है।

वर्तमान में वित्तीय सेवाओं की कुछ फीस पर 18 प्रतिशत GST लागू होता है। इसलिए प्रोसेसिंग फीस जैसी राशि पर टैक्स जुड़ने से खरीदारी की अंतिम लागत बढ़ सकती है।

ग्राहकों को यह समझना चाहिए कि नो कॉस्ट EMI का मतलब हर परिस्थिति में पूरी तरह बिना किसी अतिरिक्त खर्च के खरीदारी नहीं होता।

समझदारी से करें EMI पर खरीदारी

किसी भी उत्पाद को खरीदने से पहले उसकी एकमुश्त भुगतान कीमत और EMI की कुल कीमत की तुलना जरूर करें। प्रोसेसिंग फीस, GST और अन्य संभावित शुल्कों को भी अंतिम भुगतान में शामिल करें।

सिर्फ कम मासिक किस्त देखकर गैर-जरूरी खरीदारी करने से बचें। अपनी मासिक आय और पहले से चल रही EMI को ध्यान में रखकर ही नया वित्तीय फैसला करें।

नो कॉस्ट EMI एक सुविधाजनक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसकी वास्तविक लागत समझना जरूरी है। सही जानकारी और सावधानी के साथ खरीदारी करने से ग्राहक छिपे हुए खर्चों और अनावश्यक कर्ज के बोझ से बच सकते हैं।

7.8% नहीं 2.6% है GDP ग्रोथ, आंकड़ों में हेरफेर कर झूठ परोस रही मोदी सरकार? जानें क्यों मचा है सियासी बवाल

Ram Mandir Trust Decisions: पहले CEO जितेंद्र मिश्रा, गोविंद गिरी महासचिव, राम मंदिर में किसे क्या जिम्मेदारी?

भावनगर पारा यार्ड रिमॉडलिंग को रेलवे की मंजूरी; ₹125 करोड़ से होगा अपग्रेड, जानें प्रोजेक्ट की मुख्य विशेषताएं

Kal Ka Mausam : यूपी-बिहार समेत 19 राज्यों में भारी बारिश और आंधी का अलर्ट, 70 KM की रफ्तार से चलेंगी हवाएं

मोदी कैबिनेट में फेरबदल की तैयारी... नितिन गडकरी का बदलेगा मंत्रालय! महाराष्ट्र से किसे मिलेगी जगह?