Religion Conversion SC Status: सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश ने एक संवैधानिक व नैतिक बहस को जन्म दे दिया है कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म स्वीकार करता है तो वह अपना अनुसूचित जाति का दर्जा तत्काल खो बैठेगा।
यह कहा गया कि लोग हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर ईसाई बन जाएंगे, उन्हें एससी/एसटी (क्रूरता निवारण) कानून का संरक्षण नहीं मिल पाएगा। संविधान के अनुच्छेद 341 के आधार पर यह निर्णय दिया गया।
यह अनुच्छेद सरकार को अनुसूचित जाति की पहचान का अधिकार देता है। ऐतिहासिक रूप से यह जातियां कुछ धर्मों से जुड़ी हुई हैं। जाति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है। धर्म बदलने का तात्पर्य यह हुआ कि व्यक्ति उस ढांचे से बाहर आ गया।
कानूनी तौर पर यह बात तर्कसंगत हो सकती है। परंतु देखा गया है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी जातिगत भेदभाव खत्म नहीं होता। दलित ईसाइयों को भी सामाजिक, आर्थिक तौर पर व धार्मिक समुदायों के भीतर भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
कुछ चर्च उनसे दूरी बरतते हैं। उन्हें एससी/एसटी (प्रीवेंशन ऑफ एट्रोसिटी एक्ट) वाले संरक्षण से वंचित करने से उनकी हालत कमजोर हो जाएगी। कोई दलित ईसाई धर्म अपना लेने से ही अन्य ईसाइयों के बीच बराबरी का दर्जा नहीं पा लेता।
धर्मांतरण के बावजूद उसकी जातिगत पहचान बनी रहती है। यदि धर्म बदलने के बाद भी किसी व्यक्ति को जाति के आधार पर अपमान व भेदभाव का शिकार होना पड़े तो उसका क्या इलाज है? एक मुद्दा यह भी है कि संविधान का अनुच्छेद 25 अपनी मर्जी से धर्मांतरण का अधिकार देता है।
यदि धर्मांतरण के बाद कानूनी सुरक्षा न मिले तो उसका कोई प्रयोजन नहीं रह जाता और सामाजिक दर्जा भी नहीं बदलता, ऐसी स्थिति में कार्यपालिका की जिम्मेदारी सामने आती है।
संसद को देखना होगा कि क्या कोई कानून वर्तमान सामाजिक सच्चाइयों को सही तौर पर प्रतिबिंचित करता है या नहीं। क्या एससी/एसटी के दर्जे को धर्म से जोड़ना उचित होगा? संविधान के अनुसूचित जाति आदेश 1950) को धारा 3 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति दर्ज किए गए धर्म की बजाय दूसरे धर्म का पालन करता है और दूसरी ओर अपने पहले के धर्म की अनुसूचित जाति की सदस्यता कायम रखने का आग्रह करता है तो क्या यह संभव होगा? विश्व के अन्य देशों में जातिभेद नहीं माना जाता, लेकिन भारत में धमांतरण करने पर भी जाति व्यवस्था नष्ट नहीं होती।
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भारतीय मुस्लिमों में आज भी 40 से अधिक जातियां हैं। वहां अंसारी, जुलाहे या बुनकर हैं तो कुरैशी मांस बिक्री का धंदा करने वाले मुस्लिमों में भी शेख, सैयद, मुगल, पठान हैं।
अहमदिया मुस्लिमों के साथ भेदभाव होता है। पसमांदा मुस्लिम उपेक्षित व गरीब बने हुए हैं। धर्मांतरित ईसाईयों में बड़ी तादाद आदिवासी व दलित समुदायों की है। देश में इतने समाज सुधारक हुए, लेकिन जातिप्रथा की बेड़ियां अब तक नहीं टूट पाई।
लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा