अजीत डोभाल और चीन के विदेशमंत्री वांग यी फोटो सोर्स- नवभारत डिजाइन
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नवभारत संपादकीय: भारत-चीन सीमा विवाद के बीच अरुणाचल में कमांडरों की अहम बैठक, क्या निकला हल?

India China Border Talks: भारत-चीन सीमा विवाद के बीच अरुणाचल प्रदेश में दोनों देशों के कमांडरों ने शांति बनाए रखने पर की चर्चा। बातचीत को जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

अंकिता पटेल

Arunachal India China Border: भारत-चीन सीमा विवाद को हल करने के उद्देश्य से दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच 8 बिंदुओं पर हुई सहमति के कुछ दिन बाद अरुणाचल में दोनों ओर के कोर कमांडरों के बीच शांति और स्थिरता बनाए रखने पर चर्चा हुई। अरुणाचल के अपर सुबानसिरी क्षेत्र में चीनी सैनिकों की हलचल को देखते हुए यह बातचीत हुई।

इसका महत्व चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्रस्तावित भारत यात्रा के संदर्भ में हैं। वह 12-13 सितंबर को दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में आ सकते हैं। इसके पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन के विदेशमंत्री वांग यी के बीच 25 अगस्त को बातचीत हुई थी। इस बैठक में सीमा हुई थी।

सीमा विवाद के बीच चीन पर भरोसा कितना?

इस बैठक में सीमा निर्धारण तथा आपसी सहयोग पर विचार किया गया था। इसमें एक विशेषज्ञ समूह और एक कार्यकारी समूह गठित करने की बात तय हुई थी। मुद्दा यह है कि क्या इससे दोनों पड़ोसी देशों के बीच विश्वास पनपेगा? भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पश्चिमी सेक्टर (लद्दाख), मध्य सेक्टर (उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश) तथा पूर्वी सेक्टर (सिक्किम व अरुणाचल) के बीच बंटी हुई है।

चीन हमारे राज्य अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत बताकर उस पर अपना दावा जताता है। वह ब्रिटिश शासकों द्वारा तय की गई मैकमोहन लाइन को भारत-चीन की सीमा रेखा नहीं मानता। चीन ने 2020 में एलएसी पर यथास्थिति तोड़ने का प्रयास करते हुए लद्दाख में घुसपैठ की थी। गलवान में दोनों सेनाओं की झड़प भी हुई थी। भारत को चीन की दगाबाजी का कटु अनुभव है।

चीन से सहयोग जरूरी, लेकिन सतर्कता भी जरूरी

1962 में चीन ने खुद को एशिया का बिग ब्रदर बताने के लिए भारत की उत्तरी सीमा पर हमला किया था। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी चीन ने अपने शस्त्र देकर पाकिस्तान की मदद की थी। अब चीन भी समझ गया है कि भारत रक्षाक्षेत्र में मजबूत हो गया है और सीमा विवाद में उलझे रहने की बजाय भारत से व्यापार सहयोग बढ़ाना बेहतर रहेगा।

भारत ने भी स्थानीय कंपनियों में चीनी पूंजी निवेश पर प्रतिबंध शिथिल किए हैं लेकिन यह केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित है। भारत अब भी चीन निर्मित कार नहीं खरीद रहा है। कुछ भारतीय कंपनियां चीन में काम कर रही हैं। विस्तारवादी चीन के इरादों के प्रति हमेशा सतर्क रहना होगा। प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने सोचा था कि एशिया की प्रगति के लिए भारत-चीन सहयोग फलदायी रहेगा, लेकिन चीन ने पंचशील समझौते की धज्जियां उड़ाकर भारत पर विश्वासघाती हमला किया था। इसलिए उसके साथ किसी भी सहयोग में सतर्कता बरतना आवश्यक है।

लेख- चंद्रमोहन द्विवेदी के द्वारा

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