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नवभारत विशेष: जेन अल्फा के आंदोलन को हल्के में न ले सरकार, बदलती युवा सोच और बढ़ते आक्रोश को समझने का वक्त

Gen Alpha Protest: सरकारी स्कूलों में सुधार और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर जेन अल्फा का प्रदर्शन जारी है। छात्रों के इस बड़े आंदोलन को सरकार हलके में न ले।

अनन्या तिवारी

Gen Alpha School Reform Movement: कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में जेन जी ने दिल्ली के जंतरमंतर पर प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की जवाबदेही व शिक्षा नीतियों को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था। अब सीजेपी का फोकस देशभर के सरकारी स्कूलों में सुधार लाने के संदर्भ में है। इस सिलसिले में अग्रणी भूमिका जेन अल्फा निभा रही है। जमीनी स्तर पर स्कूली छात्रों का यह आंदोलन बुनियादी स्कूल इन्फ्रास्ट्रक्चर व बेहतर शैक्षिक सुविधाओं की मांग कर रहा है।

सरकारी स्कूलों की बदहाली और छात्रों का विरोध

जेन अल्फा स्कूली छात्रों का फोकस इस बात पर है कि स्कूलों में पीने का साफ पानी उपलब्ध हो, खाने योग्य मिड-डे मील हो, टॉयलेट्स साफ सुथरे हों, कक्षाओं में पंखे व कुर्सी मेज और पर्याप्त संख्या में अध्यापक हों। जेन अल्फा के ये प्रदर्शन व धरने मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र में देखने को मिल रहे हैं। इन राज्यों में अधिकतर सरकारी स्कूलों में हालात बद से बदतर हैं किसी स्कूल में एक अध्यापक है या एक भी नहीं है और कोई स्कूल जानवरों के तबेले में चल रहा है।

विभिन्न राज्यों में आंदोलन का असर

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में 1500 से अधिक जेन अल्फा छात्रों ने स्कूल में खराब सैनिटेशन व पीने का पानी न होने के विरोध में धरना दिया। राजस्थान में छात्रों ने स्कूल के दरवाजों पर ताले लगाकर कक्षाओं का बायकाट किया; क्योंकि पर्याप्त संख्या में अध्यापक न थे। राज्य सरकार तुरंत हरकत में आई और टीचिंग स्टाफ को तैनात किया। मध्य प्रदेश व बिहार में जेन अल्फा ने सड़कों व स्थानीय प्रशासनिक कार्यालयों के सामने खराब मिड-डे मील व अनहाइजीनिक स्कूल स्थितियों को लेकर विरोध प्रदर्शन किये, आधिकारिक जांच के आदेश दिये गए। जेन अल्फा प्रदर्शनकारियों ने अपनी स्थानीय परेशानियों व शिकायतों को उजागर करने के लिए सोशल मीडिया व डिजिटल टूल्स का भी भरपूर इस्तेमाल किया।

विरोध और राजनीतिक हिंसा की घटनाएं

राज्य सरकारों को चाहिए कि वह जेन अल्फा की उचित मांगों व शिकायतों का संज्ञान लें और सरकारी स्कूलों के हालात बेहतर करने के लिए कदम उठाएं। सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति पर पर्दा डालने के लिए सरकार-समर्थक राजनीतिक गुट भी हिंसक रूप से सक्रिय हो गए हैं। सीजेपी के सह-संयोजक आशुतोष रांका अपनी 50-60 सदस्यों की टीम के साथ रामपुरा कंवरपुरा गांव (राजस्थान) के सरकारी प्राइमरी स्कूल का जायजा लेने के लिए जा रहे थे कि छात्रों को असुरक्षित टीन-शेड के नीचे पढ़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

आंकड़ों के आईने में सरकारी शिक्षा तंत्र

उन्हें रोकने के लिए बीजेपी व बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने बीच रास्ते में ट्रैक्टर-ट्राली से सड़क बंद कर दी, उन पर हिंसक हमले किये गए, इस हिंसा में एक सीजेपी कार्यकर्ता का हाथ टूटा, देश के अधिकतर सरकारी स्कूलों की हालत चिंताजनक है। नीति आयोग व शिक्षा मंत्रालय के डाटा के अनुसार 2014-15 व 2024-25 के दौरान देशभर में 94,000 सरकारी स्कूलों को बंद किया गया या दूसरे स्कूलों में मिलाया गया यानी औसतन 25 स्कूलों के साथ रोजाना ऐसा हुआ। इस अवधि के दौरान 2.26 करोड़ छात्रों ने सरकारी स्कूलों को छोड़ा।

एक शिक्षक के भरोसे हजारों स्कूल

यूडीआईएसई के हाल के डाटा में बताया गया है कि देश में 1,00,843 स्कूलों में सिर्फ एक अध्यापक है, जबकि इन स्कूलों में 33 लाख से अधिक छात्र हैं। अध्यापकों का वेतन इतना ज्यादा कर दिया है कि राज्य सरकारें नई नियुक्तियों से कतराती हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भी ध्यान नहीं दिया जाता है। अगर राज्य सरकारों ने सरकारी स्कूलों के हालात सुधारने के लिए जल्द सकारात्मक कदम न उठाये, तो जेन अल्फा व जेन जी का 'स्कूल ठीक करो' आंदोलन जबरदस्त राजनीतिक व चुनावी मुद्दा बन सकता है।

- लेख डॉ. अनिता राठौर द्वारा

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