Spiritual Life: आज के भौतिक संसार में पैसा सबसे बड़ा आकर्षण बन चुका है। लेकिन यही पैसा इंसान के लिए सबसे बड़ा जाल भी साबित हो सकता है। चाहे कोई गृहस्थ हो या संन्यासी, जैसे ही मन धन में फंसता है, आध्यात्मिक पतन शुरू हो जाता है। कई लोग भाटगिरी यानी अमीरों की चापलूसी करने लगते हैं, भगवान की भक्ति छोड़कर। जब भक्त भगवान की बजाय धनवानों के पीछे चलने लगता है, तो यह दोनों के लिए विनाश का कारण बनता है।
धन कैसे कमाया गया है, यह सबसे अहम सवाल है। अधर्म से कमाया गया पैसा जहर के समान होता है, जो बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है और इंसान को गुरु और इष्ट से दूर कर देता है। ऐसा धन शांति नहीं देता, बल्कि मन में काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और मत्सर जैसी बुराइयों को बढ़ाता है।
सच्चा आध्यात्मिक मार्गदर्शन वही दे सकता है, जो कंचन, कामिनी और कीर्ति” से पूरी तरह विरक्त हो। अगर कोई इनसे जुड़ा हुआ है, तो उसकी भक्ति केवल दिखावा बनकर रह जाती है। असली भक्ति यह है कि हर जीव में भगवान को देखा जाए और खुद को संसार का सेवक माना जाए।
आज के समय में श्रीधाम वृंदावन का स्वरूप बदलता जा रहा है। जो स्थान केवल भजन और तपस्या के लिए था, वह अब पर्यटन और आराम का केंद्र बनता जा रहा है। पहले जहां लताओं से घिरे रास्तों में दिव्यता का अनुभव होता था, आज वहां गाड़ियां और आधुनिक सुविधाएं नजर आती हैं। "यदि आप अनुशासन, ब्रह्मचर्य और नाम जाप नहीं कर सकते, तो वृंदावन में रहना ही नहीं चाहिए।" पवित्र धाम में किया गया अपराध इतना भारी होता है कि वह प्रयाग के जल में खड़े होकर भी समाप्त नहीं होता।
कलियुग में ज्ञान तो बहुत है, लेकिन अनुभव बहुत कम। कई लोग आत्म-साक्षात्कार का दावा करते हैं, लेकिन मन की चिंताओं से मुक्त नहीं हो पाते। असली साधना तब होती है, जब साधक, साधना और साध्य का भेद मिट जाए। सिद्धियों यानी चमत्कारों के पीछे भागना भी भक्ति में बाधा है। सच्चे संत अपनी शक्तियों को छुपाकर रखते हैं और केवल भगवान के प्रेम में डूबे रहते हैं।
मनुष्य के छिपे हुए कर्म समय आने पर सामने आते हैं और जीवन को प्रभावित करते हैं। इनसे बचने का एक ही उपाय है गुरु और संतों की शरण में जाना। "भगवान से सांसारिक सुख या सिद्धियां मत मांगो, केवल प्रेममयी भक्ति की प्रार्थना करो।" जब मन शुद्ध होता है, तो इच्छाएं पूरी होने लगती हैं, लेकिन उस समय भी सावधान रहना जरूरी है। संसार से मुंह मोड़कर, नाम जप और गुरु की कृपा से ही सच्चा आनंद पाया जा सकता है।