Papankusha Ekadashi Ki Katha: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और कथा सुनने से पापों से मुक्ति तथा भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। इस अवसर पर बहेलिए से जुड़ी यह प्रचलित व्रत कथा पढ़ी जाती है।
पापांकुश एकादशी में आने वाला शब्द अंकुश, एक ऐसा उपकरण है, जिसका इस्तेमाल परंपरागत रूप से हाथी को दिशा देने और नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। पापांकुशा एकादशी के नाम में अंकुश का अर्थ है- जिस तरह अंकुश हाथी को दिशा देने का माध्यम है, उसी तरह इस व्रत को मनुष्य के कर्मों और आचरण पर नियंत्रण रखने की सीख माना जाता है। इस एकादशी व्रत का संदेश यह है कि व्यक्ति अपनी गलतियों को पहचाने, बुरे कर्मों से बचे और अपने व्यवहार में सुधार करने का प्रयास करे।
पौराणिक कथा के अनुसार, विंध्य पर्वत के क्षेत्र में क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था। वह अपने जीवन में हिंसा और बुरे कर्मों में डूबा रहता था। उसने अपना अधिकांश जीवन इसी तरह बिताया। जब उसके जीवन का अंतिम समय आया, तो उसे मृत्यु का भय सताने लगा। उसे चिंता हुई कि जीवन भर किए गए बुरे कर्मों का परिणाम उसे भुगतना पड़ेगा।
परेशान होकर वह महर्षि अंगिरा के पास पहुंचा। उसने ऋषि को प्रणाम किया और उनसे अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा। बहेलिए ने अपनी गलतियों को स्वीकार करते हुए ऋषि से ऐसा मार्ग बताने की प्रार्थना की, जिससे उसका कल्याण हो सके।
बहेलिए की बात सुनकर महर्षि अंगिरा ने उसे आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी व्रत करने की सलाह दी। ऋषि ने उसे भगवान विष्णु की पूजा करने, उनका नाम जपने और श्रद्धा के साथ व्रत रखने के बारे में विस्तार से समझाया।
महर्षि के बताए अनुसार, बहेलिए ने पापांकुशा एकादशी का व्रत रखा और भगवान विष्णु की आराधना की। व्रत के पुण्य प्रभाव से उसे अपने पापों से मुक्ति मिली और अंत में भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त हुआ।
पापांकुशा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत, पूजा, भगवान का नाम-स्मरण और जरूरतमंदों को दान करने का विशेष महत्व है। भक्त इस दिन भगवान विष्णु से अपने जाने-अनजाने अपराधों के लिए क्षमा मांगते हैं और अच्छे मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।