साबूदाना बनाने की प्रक्रिया सोर्स- सोशल मीडिया
साबूदाना किसी अनाज से नहीं बनता। इसे टैपिओका या कसावा नामक कंद की जड़ों से निकाले गए स्टार्च से तैयार किया जाता है। यही स्टार्च आगे चलकर छोटे-छोटे सफेद दानों का रूप लेता है।साबूदाने की शुरुआत खेतों में उगने वाले कसावा के पौधे से होती है। इसके नीचे जमीन में मोटी कंद वाली जड़ें विकसित होती हैं, जिनमें स्टार्च की अच्छी मात्रा होती है।जब कसावा की फसल तैयार हो जाती है, तो उसकी जड़ों को जमीन से निकाला जाता है। इसके बाद जड़ों की सफाई करके मिट्टी और दूसरी बाहरी गंदगी हटाई जाती है।साफ की गई कसावा जड़ों को पीसकर या प्रसंस्करण के जरिए गूदे जैसा बनाया जाता है। इसके बाद पानी की मदद से स्टार्च को रेशेदार हिस्से से अलग किया जाता है।कसावा के गूदे से मिले मिश्रण को छानने पर रेशे अलग होते हैं और स्टार्च वाला भाग प्राप्त होता है। खाद्य मानकों में भी कसावा से आटा या स्टार्च प्राप्त करने की प्रक्रिया में रेशे अलग करने के लिए छानने का उल्लेख है।प्राप्त स्टार्च को आगे साफ और व्यवस्थित किया जाता है, ताकि अनचाहे कण और बाकी अशुद्धियां अलग हो सकें। इसके बाद स्टार्च को साबूदाना बनाने के लिए तैयार किया जाता है।अब स्टार्च को विशेष प्रक्रिया से छोटे गोल दानों का आकार दिया जाता है। इस प्रक्रिया को दानों का आकार देने या गोलिकरण के रूप में समझा जा सकता है। आकार दिए गए साबूदाने के दानों में नमी होती है। इसलिए उन्हें नियंत्रित तरीके से सुखाया जाता है, जिससे दाने टिकाऊ बनें और उनमें आवश्यक नमी का स्तर बना रहे।सूखने के बाद साबूदाने को छाना और आकार के अनुसार अलग किया जाता है। भारतीय खाद्य मानकों के अनुसार साबूदाने के दाने साफ, मजबूत और समान रंग, आकार तथा आकृति वाले होने चाहिए।कई चरणों से गुजरने के बाद कसावा की जड़ से निकला स्टार्च सफेद मोती जैसे साबूदाने में बदल जाता है। यही साबूदाना आगे खिचड़ी, खीर, वड़ा और दूसरे व्यंजनों में इस्तेमाल किया जाता है।