दशहरा रावण दहन फोटो सोर्स- AI
दशहरे पर हर साल रावण के दस सिर वाले पुतले जलाए जाते हैं, पर इन सिरों का असली अर्थ क्या है? कोई इन्हें ज्ञान से जोड़ता है, कोई बुराइयों से, तो कहीं इनके पीछे तपस्या की कथा है। आइए तस्वीरों में जानें, दस सिरों से जुड़ी 10 प्रचलित मान्यताएँ।वाल्मीकि रामायण में रावण को दशग्रीव और दशानन कहा गया है, यानी दस गर्दन और दस मुख वाला। उसकी बीस भुजाओं का भी उल्लेख मिलता है। मूल कथा में यह उसके अलौकिक बल और रूप का वर्णन है, जिसे आगे चलकर लोगों ने अलग-अलग प्रतीकात्मक अर्थ भी दिए।एक लोकप्रिय मान्यता के अनुसार रावण के दस सिर चार वेदों और छह शास्त्रों में उसकी निपुणता के प्रतीक हैं। रावण को परंपरा में महान विद्वान और ज्ञानी माना गया है। इस व्याख्या में दस सिर बुद्धि और विद्या की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं।कुछ प्रवचनों में कहा जाता है कि दस सिर मनुष्य की दस इंद्रियों के प्रतीक हैं। आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा ये पाँच ज्ञानेंद्रियाँ हैं। वाणी, हाथ, पैर और दो उत्सर्जन अंग ये पाँच कर्मेंद्रियाँ हैं। जो इन पर काबू नहीं रख पाता, उसका पतन निश्चित माना गया है।सबसे प्रचलित व्याख्या में दस सिर दस दुर्गुणों को दर्शाते हैं। इनमें आम तौर पर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर (ईर्ष्या), अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी गिनाई जाती हैं। हालाँकि इन दस दोषों की सूची अलग-अलग वक्ताओं के यहाँ थोड़ी बदल जाती है। रावण दहन को इन्हीं बुराइयों के त्याग का संकेत माना जाता है।कुछ लोक-व्याख्याओं में दस सिर दसों दिशाओं (आठ मुख्य दिशाओं के साथ ऊपर और नीचे) पर रावण के प्रभाव का प्रतीक माने जाते हैं। रामायण में उसे तीनों लोकों को हिला देने वाला शक्तिशाली राजा बताया गया है। यह व्याख्या उसके विस्तृत साम्राज्य और पराक्रम की ओर इशारा करती है।रामायण की कथाओं में बताया गया है कि रावण ने वरदान पाने के लिए कठोर तप किया और अपने सिर अर्पित किए। वाल्मीकि रामायण में यह तप ब्रह्मा जी के लिए बताया गया है, जबकि कई लोक कथाओं में यह भगवान शिव की आराधना से जुड़ी है। इसी कथा में हर बार सिर कटने पर नया सिर उग आने की मान्यता भी मिलती है।जैन ग्रंथों की एक कथा के अनुसार रावण के जन्म के समय उसके गले में नौ मणियों का हार था। इन मणियों में उसका चेहरा नौ बार और असली मुख मिलाकर दस जैसा दिखा, इसलिए उसे दशानन कहा गया। इस मान्यता में दस सिर शारीरिक नहीं, बल्कि प्रतिबिंब का नतीजा माने जाते हैं।परंपरा में रावण को शिव का परम भक्त, वीणा-वादक और विद्वान बताया गया है। शिव तांडव स्तोत्र की रचना भी उसी से जोड़ी जाती है। इन्हीं गुणों के कारण दस सिरों को "अत्यधिक ज्ञान" का प्रतीक भी माना गया, पर अहंकार ने उसे पतन की ओर धकेल दिया। इसीलिए कहा जाता है कि ज्ञान के साथ विनम्रता भी जरूरी है।भारत में कुछ जगहों पर रावण की पूजा या उसके प्रति सम्मान की परंपरा है। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा का बिसरख गाँव, जिसे उसका जन्मस्थान माना जाता है, वहाँ दशहरे पर पुतला दहन नहीं होता। जोधपुर के मंडोर में भी कुछ समुदाय रावण को अपना दामाद मानकर शोक मनाते हैं। इन परंपराओं में उसे ज्ञानी और शिव-भक्त के रूप में याद किया जाता है।दशहरे पर जलते रावण को सिर्फ़ एक पात्र का अंत नहीं, हमारे भीतर की बुराइयों के अंत का संकेत माना जाता है। हर सिर एक सबक देता है कि अहंकार, लोभ और क्रोध किसी को भी, चाहे वह कितना ही विद्वान क्यों न हो, गिरा सकते हैं। इस दशहरे पर बाहर के पुतले के साथ भीतर की एक बुराई छोड़ने का संकल्प लें।